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मैं क्या हूँ

Main Kya Hoon

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मैं क्या हूँ

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Number of Pages 48
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

इस संसार मैं जानने योग्य अनेक बातें हैं | विद्या के अनेकों सूत्र हैं, खोज के लिए, जानकारी प्राप्त करने के लिए, अमित मार्ग हैं| अनेकों विज्ञान ऐसे हैं, जिनकी बहुत कुछ जानकारी मनुष्य की स्वाभाविक वृति है | क्यों ?कैसे ? कहाँ ? कब ? के प्रशन हर क्षेत्र मैं वह फेंकता है | इस  जिज्ञासा भाव के| सचमुच ज्ञान ही जीवन का प्रकाश स्तम्भ है | कारण ही मनुष्य अब तक इतना ज्ञानसम्पन्न और साधनसम्पन्न बना है

जानकारी की अनेक वस्तुओं में से "अपने आपकी जानकारी " सर्वोपरि है | हम बाहरी अनेक बातों को जानते हैं या जानने का प्रयत्न करते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि हम स्वयं क्या हैं ? अपने आपके ज्ञान प्राप्त किए बिना जीवन क्रम बड़ा डांवाडोल, अनिश्चित और कंटकाकीर्ण हो जाता है | अपने वास्तविक स्वरूप की जानकारी न होने केकारण मनुष्य न सोचने लायक बातें सोचता है और न करने लायक कार्य करता है | सच्ची सुख -शान्ति का राजमार्ग एक ही है, और वह है -"आत्मज्ञान "|

Product Description

 

इस पुस्तक में आत्मज्ञान की शिक्षा है | "मैं क्या हूँ ?" इस प्रशन का उत्तर शब्दों द्वारा नहीं, वरन साधना द्वारा ह्रदयंगम करने का प्रयत्न इस पुस्तक में किया गया है यह पुस्तकअध्यात्म मार्ग के पथिकों का उपयोगी पथ प्रदर्शन करेगी, ऐसी हमें आशा है

 

किसी व्यक्ति से पूछा जाये कि आप कौन हैं ? तो वह अपने वर्ण, कुल, व्यवसाय, पद या सम्प्रदाय का परिचय देगा ! ब्राहमण हूँ, अग्रवाल हूँ, बजाज हूँ, तहसीलदार हूँ, वैष्णव हूँ आदि उत्तर होंगे ! अधिक पूछने पर अपने निवास स्थान, वंश, व्यवसाय  आदि का अधिकाधिक विस्तृत परिचय देगा ! ब्राह्मण हूँ, अग्रवाल हूँ, बजाज हूँ, तहसीलदार हूँ, वैष्णव हूँ आदि का अधिकाधिक विस्तृत परिचय देगा ! प्रश्न के उत्तर के लिए ही यह सब वर्णन हो, सो नहीं, उत्तर देने वाला यथार्थ में अपने को वैसा ही मानता है ! शरीर भाव में मनुष्य इतना तल्लीन हो गया है कि अपने आपको वहशरीर ही समझने लगा है !

 

वंश, वर्ण, व्यवसाय या पद शरीर का होता है ! शरीर मनुष्य का एक परिधान है, औजार है, परन्तु भ्रम और अज्ञान के कारण मनुष्य अपने आपको शरीर ही मान बैठता है और शरीर के स्वार्थ तथा अपने स्वार्थ को एक कर लेता है ! इसी गड़बड़ी में जीवन अनेक अशांतियों, चिंताओं और व्यथाओं का घर बन जाता है !

 

मनुष्य शरीर में रहता हैं यह ठीक है, पर यह भी ठीक है कि वह शरीर नहीं है ! जब प्राण निकल जाते हैं, तो शरीर ज्यों-का-त्यों बना रहता है, उसमें से कोई वस्तु घटती नहीं, तो भी वह मृत शरीर बेकाम हो जाता है ! उसे थोड़ी देर रखा रहने दिया जाये, तो लाश सड़ने लगती है, दुर्गन्ध उत्पन्न होती है और कृमि पड़ जाते हैं ! देह वही है, ज्यों की त्यों, पर प्राण निकलते ही उसकी दुर्दशा होने लगती है ! इससे प्रकट है कि मनुष्य शरीर में निवास तो करता है, पर वस्तुतः वह शरीर से भिन्न है ! इस भिन्न सत्ता को आत्मा कहते हैं ! वास्तव में यही मनुष्य है ! मैं क्या हूँ ? इसका सही उत्तर यह है कि, 'मैं आत्मा हूँ !'

 

इस पाठ के मंत्र

 

- मेरी भौतिक वस्तुएँ महान भौतिक तत्व की एक क्षणिक झाँकी हैं !

- मेरी मानसिक वस्तुएँ अविच्छिन्न मानस तत्व का एक खंड है !

- भौतिक और मानसिक तत्व निर्बाध गति से बह रहे हैं, इसलिए मेरी वस्तुओं का दायरा सीमित नहीं, समस्त ब्रह्मांडों की वस्तुएँ मेरी हैं !

- अविनाशी आत्मा परमात्मा का अंश है और अपने विशुद्ध रूप में वह परमात्मा ही है !

- मैं विशुद्ध हो गया हूँ, परमात्मा और आत्मा की एकता का अनुभव कर रहा हूँ !

- सोअहमस्मि-मैं वह हूँ !

 

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