जीवन देवता की साधना - आराधना
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मानव जीवन एक सम्पदा के रूप में हम सबको मिला है | शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक हर क्षेत्र में ऐसी ऐसी अदभुत क्षमताएँ छिपी पड़ी हैं कि सामान्य बुद्धि से उभरा कल्पना भी नहीं की जा सकती | यदि उन्हें विकसित करने की विद्या अपनाई जा सके तथा सदुपयोग की दृष्टि पाई जा सके तो जीवन में लौकिक एवं पारलौकिक संपदाओं विभूतियों के ढ़ेर लग सकते हैं |
परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि मनुष्य को मानवोचित ही नहीं देवोपम जीवन जी सकने योग्य साधन प्राप्त होते हुए भी वह पशुतुल्य दीन-हीन जीवन इसलिए जीता है क्योंकि वह जीवन को परिपूर्ण, सर्वांगपूर्ण बनाने के मूल तथ्यों पर न तो ध्यान देता है, न उनका अभ्यास करता है | जीवन को सही ढंग से जीने की कला जानना तथा कलात्मक ढंग से जीवन जीना ही जीवन की कला कहलाती है व अध्यात्म का वास्तविक व्यावहारिक स्वरूप यही है | अपने को श्रेष्ठतम लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए सदगुणों-सत्प्रवृत्तियों के विकास का जो अभ्यास किया जाता है, उसी को जीवन साधना कहते हैं | उसी को जीवन-रूपी देवता की साधना-आराधना भी कह सकते हैं |
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