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युग गीता - भाग २

Yug Gita - Part 2

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युग गीता - भाग २

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Number of Pages 160
Writer’s name डॉ० प्रणव पण्ड्या
Edition/Year of Publishing 2007
Hard Bound/Paper Back Hard Bound
Publisher name शान्तिकुंज, हरिद्वार

Quick Overview

 

युग-गीता के प्रथम खंड में गीता के प्रथम तीन अध्यायों के युगानुकुल व्याख्या को रूप में परिजन पढ़ रहे हैं | यह शांतिकुंज के सभागार में निवेदक द्वारा कार्यकर्त्ताओं के मार्गदर्शन-'सेवाधर्म में कर्मयोग का समावेश-दैनंदिन जीवन में अध्यात्म का शिक्षण' प्रस्तुत करने के लिए व्याख्यानमाला के रूप में नवम्बर १९९७ से दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक प्रस्तुत किया गया था | उनके आडियो कैसेट अब उपलब्ध हैं | लिखते समय इसे जब "अखंड ज्योति" पत्रिका में धारावाहिक रूप में (मई १९९९ से) देना आरम्भ किया, तो कई परिवर्त्तन किये गये | उद्धरणों को विस्तार से दिया गया तथा उनकी प्रमाणिकता हेतु कई ग्रंथों का पुनः अध्ययन किया गया | "अखंड ज्योति" पत्रिका के विगत कई वर्षों के कई अंक पलटे गये एवं समय-समय पर उनके दिए गए निर्देशों से भरी डायरियाँ भी देखी गयीं | जो कमी बोलने में रह गयी थी-या अधूरापन सा उस प्रतिपादन में रह गया था, उसे लेखन में पूरा करने का एक छोटा सा प्रयास मात्र हुआ है |

 

Product Description

 

"गीता विश्वकोश" परम पूज्य गुरुदेव के स्वप्नों का ग्रन्थ है | उसके लिए बहुत कुछ प्रारम्भिक निर्देश भी वे दे गए हैं | वह जब बनकर तैयार होगा, तो निश्चित ही एक अनुपम ग्रन्थ होगा | उसकी पूर्व भूमिका के रूप में युग गीता को खंड-खंड में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है; ताकि विश्वकोश की पृष्ठभूमि बन सके | इस विश्वकोश में दुनिया भर के सन्दर्भ, भाष्यों के हवाले तथा विभिन्न महामानवों के मंतव्य होंगे | वह सूर्य होगा-युगगीता तो उसकी एक किरण मात्र है | युगों-युगों से गीता गायी जाती रही है - इस युगगीता का विशेष महत्व है | कितने खण्डों में यह ग्रन्थ प्रकाशित होगा, हम अभी बता नहीं सकते |

 

इस ग्रन्थ से जन-जन को ज्ञान का प्रकाश मिले, इस युग परिवर्त्तन की वेला में जीवन जीने की कला मार्गदर्शन मिले, जीवन के हर मोड़ पर जहाँ कुटिल दांवपेंच भरे पड़े हैं-यह शिक्षण मिले की इसे एक योगी की तरह कैसे हल करना है | इसमें लेखक के अपने ज्ञान-विद्वत्ता का कोई योगदान नहीं है | यह सब कुछ उसी गुरुसत्ता के श्रीमुख से निस्सृत महाज्ञान है जो योगेश्वर श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुई, परम पूज्य गुरुदेव के रूप में हमारे जीवन में आई | यह वह ज्ञान है जो उनकी लेखनी से निकल पड़ा या उदबोधन  में प्रकट हुआ | सुधी पाठकों की प्यार भरी प्रतिक्रियाएँ न होतीं, तो शायद यह ग्रन्थ आकार न ले पाता | उसी गुरुसत्ता के चरणों में श्रद्धापूरित भाव से इस गीताज्ञान की व्याख्या रूपी युगगीता का प्रथम खंड प्रस्तुत है |

 

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