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मीमान्सादर्शन

Mimansadarshan

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मीमान्सादर्शन

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Number of Pages 752
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य, माता भगवती देवी शर्मा
Edition/Year of Publishing 2005
Hard Bound/Paper Back Hard Bound
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

किसी वस्तु के स्वरूप का यथार्थ निर्णय करने की विधि को मीमांसा कहते हैं | भारतीय धर्म का मूल ग्रन्थ वेद है | वेद  के दो भाग हैं - एक को कर्मकांड, दूसरे को ज्ञानकाण्ड कहते हैं | कर्मकांड में याज्ञिक क्रियाओं एवं अनुष्ठान की विधियों का वर्णन किया गया है | ज्ञानकाण्ड में ईश्वर, जीव एवं प्रकृतिगत पदार्थों के स्वरूप और सम्बन्ध का निरूपण किया गया है | एक परिभाषा के अनुसार 'इष्ट की प्राप्ति एवं अनिष्ट-परिहार के अलौकिक उपाय बतलाने वाले ग्रन्थ को वेद कहा जाता है |' इष्ट की प्राप्ति एवं अनिष्ट का परिहार धर्माचरण से ही हो सकता है | हमें जो 'करना चाहिए' और जैसा 'होना चाहिए' जैसे प्रश्नों का समाधान धर्मशास्त्र या वेद ही कर सकते हैं, मीमांसा दर्शन की उत्पत्ति इन्हीं प्रश्नों की वास्तविक जानकारी के लिए हुई है | कर्मकांड एवं ज्ञान के निरूपण में दिखाई पड़ने वाले आपाततः विरोधों को दूर करने का लक्ष्य लेकर मीमांसा दर्शन की प्रवृत्ति होती है | इसे 'कर्म मीमांसा' भी कहते हैं, क्योंकि इसमें कर्मकांड की मीमांसा की गई है ; परन्तु सामान्य तौर पर इसे मीमंसा नाम से ही अभिहित किया गया है | ज्ञानकाण्ड का यथार्थ निरूपण करने वाले दर्शन को ज्ञान मीमांसा कहते हैं, जिसे सामान्यतया वेदांत कहते हैं | वेद का पूर्व खंड कर्मकांड तथा उत्तरखंड ज्ञानकाण्ड होने के कारण मीमांसा को पूर्व मीमांसा तथा वेदांत को उत्तर मीमांसा कहते हैं | मीमांसा दर्शन में वैदिक कर्मकांडों की समस्याओं और शंकाओं का समाधान किया गया है, इसी कारण दूसरे सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए भी इसकी उपादेयता बढ़ जाती है; परन्तु दूसरा पक्ष इसीलिए इसे दर्शन मानने से इंकार भी करता है | उसका कहना है कि इसके मूल सूत्रग्रंथ में प्रमाणों के अतिरिक्त और किसी भी दार्शनिक तत्व का समावेश नहीं है | मीमांसा का मुख्य विषय 'धर्म' को जानना तथा वेदार्थ का विचार करना है | मीमांसा में प्रमाणों का विचार अन्य दर्शनों की तरह केवल दार्शनिक 'प्रमेय' को जानने के लिए नहीं है ; परन्तु बाद में सूत्र के व्याख्याकारों ने आत्मा, मुक्ति, शरीर, इन्द्रिय आदि दार्शनिक तत्वों का विवेचन भी इसमें किया है | फिर भी अन्य दर्शनशास्त्रों की तरह इन तत्वों का विचार इसमें बहुत समन्वित नहीं है, इस बात को कुमारिलभट्ट ने भी स्वीकार किया है | इसलिए मीमांसा को दर्शन  शास्त्र में परिगणित करने के लिए युक्ति  दी  जा  सकती है कि मीमांसा में 'धर्म' का विचार किया गया है | जो लोक और परलोक में कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है, 'धर्म' कहलाता है | धर्म पर विचार करना दर्शनशास्त्र का ही विषय है |

 

Product Description

 

षड्दर्शनों  में मीमांसा दर्शन की परिगणना का एक कारण यह भी है कि इसके सूत्रों  की परिगणना का एक कारण यह भी है कि इसके सूत्रों  की व्याख्या करने वालों  ने प्रमाण-मीमांसा, ज्ञान-मीमांसा आदि विषयों  का विषद  विवेचन किया है | दर्शन का प्रतिपादन  युक्ति - प्रधान  होता  है और युक्तियों  का आधार  लौकिक  अनुभव  होता  है ; परन्तु मीमांसा दर्शन की विशेषता  यह  है कि यहाँ  उक्तियों  का प्रयोग  मुख्य रूप  से आप्त  वचनों  के समर्थन  एवं उनकी  पुष्टि  के लिए किया गया है

 

मीमांसा दर्शन के सूत्रों को महर्षि जैमिनी प्रणीत माना गया है और अन्य दूसरे दर्शनों की तरह इसके विचार सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध सूत्रों के रूप में हुए हैं ! वेद जिसका विधान करें, वह धर्म है और जिसका निषेध करें, वह अधर्म है ! धर्म के विचार प्रसंग में कायिक, वाचिक तथा सत्कर्मों का विचार करना आवश्यक है ! इसी विचार के द्वारा अंतःकरण को पवित्र किया जा सकता है ! मीमांसा-शास्त्र प्रत्येक जिज्ञासु के लिए आध्यात्मिक चिंतनकी शिक्षा देता है ! इसलिए भी इसे दर्शनशास्त्र कहने में कोई आपत्ति नहीं है ! 'धर्म' (कर्त्तव्य) पालन का विचार जिस शास्त्र में होता है, उसे दर्शनशास्त्र कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ! 'धर्म' का विचार करके यदि जीवन के सभी कर्म किये जाएँ, तो मानव जीवन का परम लक्ष्य अवश्य मिलेगा !

 

ऐसा अनुमान किया जाता है कि जब वैदिक धर्म पर बौद्धों के द्वारा बहुत आक्षेप किये जा रहे थे, उस समय वेद की रक्षा के लिए मीमांसा शास्त्र की रचना की गई ! यही कारण है कि न्याय शास्त्र की तरह से मीमांसा शास्त्र की जन्मभूमि भी मिथिला ही कही जाती है ! मीमांसा के जितने ग्रन्थ एवं आचार्य मिथिला में हुए हैं, उतने अन्य क्षेत्रों में नहीं हुए हैं ! पंद्रहवीं सदी की एक 'प्रशस्ति' के आधार पर यह कहा जाता है कि जिस समय मिथिला में महाराजा मिथिलेश भैरवसिंह थे, उस समय एक पुष्करिणी का यज्ञ हुआ था, उसमें आमंत्रित विद्वानों में केवल मीमांसा विद्वानों कि संख्या चौदह सौ थी !

 

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