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सुनसान के सहचर

Sunsan Ke Sahachar

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सुनसान के सहचर

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Number of Pages 103
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

इसे एक सौभाग्य, संयोग ही कहना चाहिए कि जीवन को आरम्भ से अन्त तक एक समर्थ सिद्ध पुरुष के संरक्षण में गतिशील रहने का अवसर मिल गया।

 

उस मार्गदर्शक ने जो भी आदेश दिये वे ऐसे थे जिनमें इस अकिंचन जीवन की सफलता के साथ-साथ लोक-मंगल का महान प्रयोजन भी जुड़ा है।

 

15 वर्ष की आयु में उनकी अप्रत्याशित अनुकम्पा बरसनी शुरू हुई। इधर से भी यह प्रयत्न हुए कि महान गुरु के गौरव के अनुरूप शिष्य बना जाए। सो एक प्रकार से उस सत्ता के सामने आत्मसमर्पण हो ही गया। कठपुतली की तरह अपनी समस्त शारीरिक और भावनात्मक क्षमताएँ उन्हीं के चरणों पर समर्पित हो गयीं।

 

जो आदेश हुआ उसे पूरी श्रद्धा के साथ शिरोधार्य पर कार्यान्वित किया गया अपना यही क्रम अब तक चलता रहा है। अपने अद्यावधि क्रिया-कलापों को एक कठपुतली की उछल-कूद कहा जाय तो उचित ही विशेषण होगा।

 

Product Description

 

१ हमारा अज्ञातवास और तप साधना का उद्येश्य

२ हिमालय में प्रवेश

३ प्रकृति का रुद्राभिषेक

४ सुनसान की झोपड़ी

५ सुनसान के सहचर

६ विश्व समाज की सदस्यता

७ हमारी जीवन साधना के अन्तरंग पक्ष-पहलु

८ हमारे द्रश्य जीवन की अद्रश्य अनुभूतियाँ

 

 

सँभल कर चलने वाले खच्चर

 

 

पहाड़ों पर बकरी के अतिरिक्त खच्चर ही भार वाहन का काम करते हैं | सवारी के लिए भी उधर वे ही उपलब्ध हैं | जिस प्रकार अपने नगरों की सड़कों पर गाड़ी, ठेले, टाँगे, रिक्शे चलते हैं | उसी तरह चढ़ाव -उतार की विषम और खतरनाक पगडंडियों पर यह खच्चर ही निरापद रूप से चलते -फिरते नजर आते हैं |

देखा कि जिस सावधानी से ठोकर और खतरा बचाते हुए इन पगडंडियों पर हम लोग चलते हैं उसी सावधानी से यह खच्चर भी चल रहे हैं | हमारे सर की बनावट ऐसी है की पैरों के नीचे की जमीन को देखते हुए ठोकरों को बचाते हुए आसानी से चल सकते हैं, पर खच्चर के बारे में ऐसी बात नहीं है | उनकी आँखें ऐसी जगह लगी हैं, और गर्दन का मुडाव ऐसा है जिससे सामने देखा जा सकता, पर पैरों के नीचे देख सकना कठिन है | इतने पर भी खच्चर का हर कदम बड़ी सावधानी से और सही -सही रखा जा रहा था, जरा -सी चुक होने पर वह भी उसी तरह लुढ़ककर मर सकता है, जैसे कल एक बछड़ा गंगोत्री की सड़क पर चूर-चूर हुआ मरा पड़ा देखा था, बेचारे का पैर जरा -सी असावधानी से गलत जगह पर पड़ा कि अस्सी फुट की ऊंचाई से आ -गिरा और उसकी हड्डी पसली चकनाचूर हो गयी | ऐसा कभी -कभी ही होता है | खच्चरों के बार में तो ऐसी घटना कभी नहीं सुनी गयी |

लादने वालों से पूछा तो उनने बताया की खच्चर रास्ता चलने के बारे में सावधानी और बुद्धिमत्ता से काम लेता है | तेज चलता है; पर हर कदम को थाह -थाह कर चलता है | ठोकर या खतरा हो तो तुरंत सँभल जाता है, बढ़े हुए कदम को पीछे हटा लेता है और दूसरी ठीक जगह पैर के सहारे तलाश आकर वहीं कदम रखता है | चलने में उसका ध्यान अपने पैरों और जमीन की स्थिति के संतुलन में ही लगा रहता है | यदि वह ऐसा न कर सका तो इस विषम भूमि में उसकी कुछ उपयोगिता ही न होती|

 

खच्चर की बुद्धिमत्ता प्रशंसनीय है | मनुष्य जबकि बिना आगे -पीछे सोचे गलत दिशा में कदम उठाता रहता है और एक के बाद एक ठोकर खाते हुए भी सम्भलता नहीं, पर इन खच्चरों को तो  देखो, कि हर कदम का संतुलन बनाए रखने में जरा भी नहीं चुकते | यदि इस उबड़ -खाबड़ दुरंगी दुनियाँ के जीवन मार्ग पर चलते हुए इन पहाड़ी खच्चरों की भाँति अपना  हर कदम सावधानी के साथ उठा सकने में समर्थ हो सकें तो हमारी स्थिति वैसी ही प्रशंसनीय हो, जैसी इस पहाड़ी प्रदेश में खच्चरों की है |

 

 

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