यज्ञ का ज्ञान विज्ञान
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इस समग्र सृष्टि के क्रियाकलाप 'यज्ञ' रूपी धुरी के चारों ओर ही चल रहे हैं | ऋषियों ने "अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः" कहकर यज्ञ को भुवन की - इस जगती की सृष्टि का आधार बिंदु कहा है | स्वयं गीताकार योगिराज श्रीकृष्ण ने कहा है - "प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा की तुम लोग इस यज्ञ कर्म के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो |" यज्ञ भारतीय संस्कृति के ऋषिगणों द्वारा सारी वसुन्धरा को दी गयी महत्वपूर्ण देन है, जिसे सर्वाधिक फलदायी एवं समग्र पर्यावरण केंद्र (ईको सिस्टम) के टिके बने रहने का आधार माना जा सकता है |
यज्ञ शब्द के अर्थ को समझाते हुए परमपूज्य गुरुदेव समग्र जीवन को यज्ञमय बना लेने को ही वास्तविक यज्ञ कहते हैं | "यज्ञार्थात कर्मणोअन्यत्र लोकोअयं कर्म बन्धनः" के गीता वाक्य के अनुसार वे लिखते है कि यज्ञीय जीवन जीकर किये गये कर्मों वाला जीवन ही श्रेष्ठतम जीवन है | इसके आलावा किये गये सभी कर्म बंधन का कारण बनते हैं व जीवात्मा कि परमात्म-सत्ता से एकाकार होने की प्रक्रिया में बाधक सिद्ध होते है | यज्ञ शब्द मात्र 'स्वाहा' - मंत्रों के माध्यम से आहुति दिए जाने के परिप्रेक्ष्य में नहीं जाना जाना चाहिए, यह स्पष्ट करते हुए उनने इसमें लिखा है कि यज्ञीय जीवन से हमारा आशय है - परिष्कृत देवोपम व्यक्त्तित्व | वास्तविक देव पूजन यही है कि व्यक्ति अपने अंतः में निहित देव शक्तियों को यथोचित सम्मान देते हुए उन्हें निरंतर बढ़ाता चले | "महायज्ञेश्च यज्ञेश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः" की मनुस्मृति की उक्ति के अनुसार सर्वश्रेष्ठ यज्ञ वह है, जिसमें व्यक्ति ब्रह्ममय - ब्राह्मणत्व भरा देवोपम जीवन जीते हुए स्वयं को, अपने शरीर, मन, अंतःकरण को परिष्कृत करता हुआ चला जाता है |
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