AWGP E-store

Skip to Main Content »

Search Site

Category Navigation:

गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति

Gayatri Mantra Ki Vilakshan Shakti

Double click on above image to view full picture

Zoom Out
Zoom In

More Views

  • Gayatri Mantra Ki Vilakshan Shakti

गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति

Be the first to review this product

Availability: Out of stock.

Rs 6.00

Additional Information

Number of Pages 32
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

किसी वस्तु के सम्बन्ध में विचार करने के लिए यह आवश्यक है की उसकी  कोई मूर्ति हमारे मन; क्षेत्र में हो | बिना कोई प्रतिमूर्ति बनाए मन के लिए किसी भी विषय में सोचना असंभव है | मन की प्रक्रिया ही यही है की पहले वह किसी वस्तु का आकार निर्धारित कर लेता है, तब उसके बारे में कल्पना शक्ति कार्य करती है | समुन्द्र किसी ने न ही भले देखा हो, पर जब समुन्द्र के बारे में कुछ सोच -विचार किया जाएगा, तब एक बड़े जलाशय की प्रतिमूर्ति मन; क्षेत्र में अवश्य रहेगी | भाषा -विज्ञान का यही आधार है | प्रत्येक शब्द के पीछे आकृति रहती है | 'कुत्ता' शब्द जानना तभी सार्थक है, जब 'कुत्ता' शब्द उच्चारण करते ही एक प्राणी विशेष की आक्रति  सामने आ जाए | न जानी हुई विदेशी भाषा को हमारे सामने कोई बोले तो उसके शब्द कान में पड़ते हैं, पर वे शब्द चिड़ियों के चहचहाने की तरह निरर्थक जान पड़ते हैं, कोई भाव मन में उदय नहीं होता | कारण यह है कि शब्द के पीछे रहने वाली आकृति का हमें पता नहीं होता | जब तक आक्रति सामने  न आए, तब तक मन के लिए असंभव है कि उस सम्बन्ध में कोई सोच विचार करे |

 

Product Description

 

ईश्वर या ईश्वरीय शक्तियों के बारे में भी यही बात है | चाहे उन्हें सुक्ष्म माना जाए या स्थूल, निराकार माना जाए या साकार, इन दार्शनिक और वैज्ञानिक झमेलों में पड़ने से मन को कोई प्रयोजन नहीं | उससे यदि इस दिशा में कोई सोच -विचार का काम लेना है, तो कोई आकृति बनाकर उसके सामने उपस्थित करनी पड़ेगी | अन्यथा वह ईश्वर या उसकी शक्ति के बारे में कुछ भी न सोच सकेगा | जो लोग ईश्वर को ' निराकार' का कोई न कोई  आकार बनाते हैं | आकाश जैसा निराकार, प्रकाश जैसे तेजोमय, अग्नि जैसा व्यापक, परमाणुओं जैसा अद्रश्य | आखिर कोई न कोई आकर उस निराकार का भी स्थापित करना ही होगा | जब तक आकार की स्थापना न होगी, मन, बुद्धि और चित्त से उसका कुछ भी  सम्बन्ध स्थापित न हो सकेगा |

 

इस विराटरूप को देखना हर किसी के लिए संभव है | अखिल विश्व ब्रहमांड में परमात्मा कि विशालकाय मूर्ति देखना और उसके अंतर्गत -उसके अंग -प्रत्यगों के  रूप में समस्त पदार्थें को देखने, प्रत्येक स्थान को ईश्वर से ओत- प्रोत देखने की भावना करने से भगवद बुद्धि जाग्रत होती है और सर्वत्र प्रभु की सत्ता से व्याप्त होने का सुद्रढ़ विश्वास निष्पाप होना इतना बड़ा लाभ है कि उसके फलस्वरूप सब प्रकार के दू;ख के अभाव का नाम है - आनंद | विराट दर्शन के फलस्वरूप निष्पाप हुआ व्यक्ति सदा अक्षय आनंद का उपभोग करता है |

 

Product Tags

Add Your Tags:
Use spaces to separate tags. Use single quotes (') for phrases.
 

My Cart

You have no items in your shopping cart.

Community Poll

The inspirational songs in the audio CD 'जीवन पथ' give excellent guidance about leading a holistic life. Do you agree?