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शिक्षा एवं विद्या

Shiksha Evam Vidya

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शिक्षा एवं विद्या

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Additional Information

Number of Pages 693
Writer’s name ब्रह्मवर्चस्
Edition/Year of Publishing 1998
Hard Bound/Paper Back Hard Bound
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

शिक्षा के विषय में सभी मूर्धन्य विचारक एक मत से बताते हैं कि इसकी पूर्णता एवं समग्रता तब ही है, जब यह तीन लक्ष्यों को पूरा करे- १.स्वावलंबन, २. व्यक्तित्व निर्माण, ३. सामाजिक सदभावना का विकास | शिक्षा व्यक्ति को जानकारी देती है और उसे जिम्मेदार नागरिक बनाती है | साक्षरता से प्रारम्भ हुई शिक्षा बड़े होने पर जब मनुष्य के मस्तिष्क का अनंत सीमा तक विस्तार करती है तो व्यक्ति व्यावहारिक ज्ञान में प्रवीण एवं विद्वत्ता का धनी माना जाने लगता है | देखा यह जाना चाहिए कि शिक्षा तंत्र क्या इतना समर्थ एवं सक्षम है कि इन उद्येश्यों को पूरा कर पाए | हमारे ऋषियों ने सार्थक एवं सर्वांगपूर्ण शिक्षा की बात कहते हुए शिक्षा एवं विद्या के समन्वय  से वे ही व्यक्तित्व के विकास कि प्रक्रिया सम्पन्न होते बतायी है | ऋषियों की द्रष्टि में शिक्षा वह है जो व्यक्ति की उदारपूर्णा की आवश्यकता को पूरा करती हो एवं विद्या वह है, जो व्यक्ति में सुसंस्कारिता का समावेश करती हो | दोनों मिलकर एक समग्र, समुन्नत व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं | विद्या से अमृत प्राप्त होने तथा सरस्वती पूजन के द्वारा विद्या कि अभ्यर्थना होने के पीछे यही तथ्य प्रमुख भूमिका निभाता आया है | यदि पात्रता विकसित हो और सही शिक्षक हो, तो जो ज्ञान संपदा प्राप्त होती है, वह बढती ही चली जाती है, जन्म -जन्मान्तरों तक साथ चलती रहती है |

 

Product Description

 

परमपूज्य गुरुदेव ने वांग्मय के इस खंड में शिक्षा एवं विद्या के इसी अंतर को बताते हुए आज की शिक्षण व्यवस्था की कमियाँ एवं सुसंस्कारिता संवर्द्धन करने वाली गुरुकुलस्तरीय विद्या को उसमें समाविष्ट किये जाने की महत्ता प्रतिपादित की है | शिक्षा का स्तर जहाँ ऊँचा होगा, निश्चित रूप से वहाँ सभ्यता का विकास सर्वोच्च स्तर पर होगा, किन्तु यदि शिक्षा के साथ-साथ विद्या या दीक्षा भी जुड़ी होगी तो संस्कारवान सुसंत्तियाँ समाज में बढती चली जाएँगी | शिक्षा जहाँ सभ्यता के विकास के लिए आवश्यक है,व्यावहारिक ज्ञान के संवर्द्धन, तथा अपने पैरों पर खड़े होने के लिए जरुरी है, वहाँ अपने जीवन के उद्येश्य को समझने, अनगढ़ता को सुगढ़ता में बदलने और जीवन जीने की कला के शिक्षण के रूप में एक पूरक की भूमिका निभाती है | इसके लिए पढ़ाई पूरी कराना और उससे आगे का शिक्षण भी कराना हर समाज के लिए आवश्यक है; किन्तु यह परिश्रम अधुरा माना जाएगा यदि शिक्षार्थियों में संवेदना के विकास, सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन, समाज परायण बनने का शिक्षण साथ-साथ नहीं दिया गया | जब शिक्षा एक साधन और व्यक्तित्व विकास एक साध्य बन जाता है तो फिर शिक्षा को उतना महत्व न देकर विद्या संवर्द्धन, के निमित्त किये गये आध्यात्मिक स्तर के प्रयास भूमिका निभाते देखे जा सकते हैं |

 

अब न तो छात्रों में वह पात्रता है और न ही विनम्रता | शिक्षक भी अपनी गरिमा के अनुरूप वह भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं, जो प्राचीनकाल के गुरुकुलों के प्राध्यापक निभाते हैं | समस्त प्रकार की प्रतिकूलताओं में रहते हुए भी गुरुकुल से निकलने वाला छात्र चरित्रनिष्ठा, प्रतिभा व लोकसेवी प्रवृत्ति की द्रष्टि से इतना खरा पाया जाता था कि सर्वसाधारण द्वारा इन्हें सतत सम्मान मिलता था | यदि आज यह शिक्षण तंत्र हमें सही बनाना है तो औपचारिक स्कूली-कोलेज स्तर की शिक्षा के साथ जीवन जीने की कला का शिक्षण देने वाली विद्या का भी समावेश करना होगा | नैतिकता इसी रूप में छात्रों में एक सदगुण के रूप में समाहित की जा सकेगी, तब न बेरोजगारी का कलंक हमारे सर पर होगा, न ही उद्यंडता से भरे छात्रों के उपद्रव और न ही खुले रूप में आम शिक्षकों की अवमानना देखने को मिलेगी |

 

पूरा वांग्मय एक सामान्तर शिक्षण तंत्र  की स्थापना की बात करता है और इस व्यवस्था को बाल-संस्कारशालाओं  से आरम्भ कर सद्ज्ञान संवर्द्धन हेतु लोकसेवी स्तर के सृजनशिल्पियों के निर्माण एवं उदात्त चरित्र वाले, श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले शिक्षकों के निर्माण की व्यवस्था भी बनाता है | यही हमारे भावी सतयुगी समाज का एक ब्ल्यू प्रिंट है, यदि सही ढंग से लिया गया तो हम राष्ट्र की भावी पीढ़ी को एक जिम्मेदार, संस्कारवान नागरिक के रूप में विकसित कर सकेंगे |

 

परमपूज्य गुरुदेव ने आम आदमी  को आत्म- मूर्छना से ग्रसित बताया है और यह कहा है कि- " वह चाहे कितना ही पढ़ा- लिखा क्यों न हो, यदि उसे ढंग से सोचना, समाज का सुनियोजन करना, प्रतिकूलताओं से मोर्चा लेना, समाज के अन्य घटकों के साथ रहना नहीं आता तो फिर उसका पढ़ा-लिखा होना न केवल बेकार है बल्कि, उस पर लगे हुआ धन भी राष्ट्रीय अपव्यय के समान है |" परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि-"ऐसे तथाकथित शिक्षितों के लिए अब संजीवनी विद्या की आवश्यकता पड़ेगी, जो उन्हें मूर्छना से उबार सके, समाज परायण बना सके |" उनका एक आशावादी मत है कि युग परिवर्तन में मनुष्यों की आकृति तो यथास्थिति रहेगी ही, पर जब यह होगा तो उनकी प्रकृति बदल जाएगी | प्रकृति से यहाँ तात्पर्य मान्यता,भावना,विचारणा और गतिविधियों का समुच्चय है | पूज्यवर लिखते हैं कि गुण, कर्म व स्वभाव का आमूलचूल परिष्कार ही उज्जवल भविष्य की सम्भावना भवितव्यता को पूरा करेगा | अध्यात्म प्रधान यह संजीवनी विद्या कौन देगा ? इसका बड़ा भाव-विभोग विवेचन वांग्मय के इस खंड में हुआ है |

 

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