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स्त्रियों का गायत्री अधिकार

Striyon Ka Gayatri Adhikar

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स्त्रियों का गायत्री अधिकार

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Additional Information

Number of Pages 40
ISBN Number 81-89309-03-x
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2008
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

कन्या और पुत्र दोनों ही माता की प्राणप्रिय संतान हैं। ईश्वर को नर और नारी दोनों दुलारे हैं। कोई भी निष्पक्ष और न्यायशील माता-पिता अपने बालकों में इसलिए भेदभाव नहीं करते कि वे कन्या हैं या पुत्र हैं। ईश्वर ने धार्मिक कर्त्तव्यों एवं आत्मकल्याण के साधनों की नर और नारी दोनों को ही सुविधा दी है। यह समता, न्याय और निष्पक्षता की दृष्टि से उचित है, तर्क और प्रमाणों से सिद्ध है। इस सीधे-सीधे तथ्य में कोई विघ्न डालना असंगत ही होगा।

Product Description

 

भारतवर्ष में सदा से स्त्रियों का समुचित मान रहा है। उन्हें पुरुषों की अपेक्षा अधिक पवित्र माना जाता रहा है। स्त्रियों को बहुधा ‘देवी’ संबोधन से संबोधित किया जाता है। नाम के पीछे उनकी जन्म-जात उपाधि ‘देवी’ प्रायः जुडी रहती है। शांति देवी, गंगादेवी, दया देवी आदि ‘देवी’ शब्द पर कन्याओं के नाम रखे जाते हैं। जैसे पुरुष बी.ए. शास्त्री, साहित्यरत्न आदि उपाधियाँ उत्तीर्ण करने पर अपने नाम के पीछे उस पदवी को लिखते हैं वैसे ही कन्याएँ अपने जन्मजात ईश्वर की प्रदत्त दैवी गुणों, दैवी विचारों, दिव्य विशेषताओं के कारण अलंकृत होती हैं।

देवताओं और महापुरुषों के साथ उनकी अर्धांगिनियों के नाम भी जुड़े हैं सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश, मायाब्रह्म, सावित्री सत्यवान आदि नामों में नारी का पहला और नर का दूसरा स्थान है। पतिव्रता, दया, करुणा, सेवा, सहानुभूति, स्नेह, वात्सल्य, उदारता, भक्ति-भावना, आदि गुणों में नर की अपेक्षा नारी को सभी विचारवानों ने बढ़ा-चढ़ा माना है।

 

इसलिए धार्मिक, आध्यात्मिक और ईश्वर-प्राप्ति संबंधी कार्यों में नारी का सर्वत्र स्वागत किया गया है और उसे उनकी महानता के अनुकूल प्रतिष्ठा दी गई है। वेदों पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि वेदों के मंत्रदृष्टा जिस प्रकार अनेक ऋषि हैं वैसे ही अनेक ऋषिकाएँ भी हैं। ईश्वरीय-ज्ञान वेद, महान आत्मा वाले व्यक्तियों पर प्रकट हुआ है और उनने उन मंत्रों को प्रकट किया। इस प्रकार जिन पर वेद प्रकट हुए उन मंत्रों को दृष्टाओं को ‘ऋषि’ कहते हैं। ऋषि केवल पुरुष ही नहीं हुए हैं, ऋषि अनेक नारियाँ भी हुई हैं। ईश्वर ने नारियों के अंतःकरण में उसी प्रकार वेद-ज्ञान प्रकाशित किया जैसे कि पुरुष के अंतःकरण में, क्योंकि प्रभु के लिए दोनों ही संतान समान हैं। महान् दयालु, न्यायकारी और निष्पक्ष प्रभु भला अपनी ही संतान में नर-नारी का पक्षपात करके अनुचित भेद-भाव कैसे कर सकते हैं ?

 

ऋग्वेद 10।85 के संपूर्ण मंत्रों की ऋषिकाएँ ‘‘सूर्या सावित्री’’ है। ऋषि का अर्थ निरुत्तर में इस प्रकार किया है ‘‘ऋषिदर्शनात् स्तोमान् ददर्शेति ऋषियो मन्त्र दृष्टारः।’’ अर्थात् मंत्रों का दृष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है।

ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची ब्रह्म देवता के 24 अध्याय में इस प्रकार है—

घोषा गोधा विश्ववारा अपालोपनिषन्नित्।

ब्रह्म जाया जहुर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादिति।।84।।

इन्द्राणी चेन्द्र माता चा सरमा रोमशोर्वशी।

लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शाश्वती।।85।।

श्रीलछमीः सार्पराज्ञी वाकश्रद्धा मेधाचदक्षिण।

रात्रि सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरितः।।86।।

अर्थात्—घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, जुहू, आदिति, इन्द्राणी, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा, यमी, शाश्वती, सूर्या, सावित्री आदि ब्रह्मवादिनी हैं।

ऋग्वेद के 10-134, 10-39, 19-40, 8-91, 10-5, 10-107, 10-109, 10-154, 10-159, 10-189, 5-28, 9-91 आदि सूक्तों की मंत्र दृष्टा यह ऋषिकाएँ हैं।

 

ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थीं। वे यज्ञ-विद्या, ब्रह्म-विद्या में पारंगत थीं। कई नारियाँ तो इस संबंध में अपने पिता तथा पति का मार्ग दर्शन करती थीं।

तैत्तिरीय ब्राह्मण में सोम द्वारा ‘सीता सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्ण विस्तारपूर्वक आता है।

......तं त्रयो वेदा अन्य सृज्यन्त अथह सीतां सावित्री सोम राजान चक्रमे....तस्या उहत्रीन वेदान प्रददौ।

-तैत्तिराय. 2।3।10

इस मंत्र में बताया गया है कि किस प्रकार सोम ने सीता सावित्री को तीन वेद दिए।

मनु की पुत्री ‘इडा’ का वर्णन करते हुए तैत्तिरीय 1-1-4 में उसे ‘यज्ञान्काशिनी’ बताया है यज्ञान्काशीनी का अर्थ सायणाचार्य ने ‘यज्ञ तत्त्व प्रकाशन समर्था’ किया है। इडा ने अपने पिता को यज्ञा संबंधी सलाह देते हुए कहा—

साऽब्रवीदिड़ा मनुम्। तथावाऽएं तवाग्नि माधास्यामि यथा प्रजथा पशुभिर्मिथुनैजनिष्यसे। प्रत्यस्मिंलोकेस्थास्यासि। असि स्वर्ग लोके जेष्यसोति।

-तैत्तिरीय ब्रा।1।4

इडा ने मनु से कहा-तुम्हारी अग्नि का ऐसा अवधान करूँगी जिससे तुम्हें भोग, प्रतिष्ठा और स्वर्ग प्राप्त हो। प्राचीन समय में स्त्रियाँ गृहस्थाश्रम चलाने वाली भी थीं और ब्रह्मपरायण भी। वे दोनों ही अपने–अपने कार्य-क्षेत्र में कार्य करती थीं। जो गृहस्थ संचालन करती थीं उन्हें ‘सद्योबधू’ कहते थे और जो वेदाध्ययन, ब्रह्म-उपासना आदि के पारमार्थिक कार्यों में प्रवृत्त रहती थीं उन्हें ‘ब्रह्मवादिनी’ कहते थे। ब्रह्मवादिनी और सद्योवधु के कार्यक्रम तो अलग-अलग थे, पर उनके मौलिक धर्माधिकारियों में कोई अंतर न था, देखिए—

द्विविधा स्त्रियो ब्रह्मवादिन्यः सद्योवध्वश्च। तत्र ब्रह्मवादिनी नामुण्यानाम अग्नोन्धनं स्वगृहे भिक्षाचर्या च। सद्योवधूनां तूपस्थते विवाहकाले विदुपनयन कृत्वा विवाह कार्यः।

-हरीत धर्मसूत्र 21।20।24

ब्रह्मवादिनी और सद्योवधू ये दो स्त्रियाँ होती हैं। इनमें से ब्रह्मवादिनी यज्ञोपवीत, अग्निहोत्र, वेदाध्ययन तथा स्वगृह में भिक्षा करती हैं। सद्योवधुओं भी यज्ञोपवीत आवश्यक है। वह विवाह काल उपस्थित होने पर करा देते हैं।

 

शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नि मैत्रेयी को ब्रह्मवादिनी कहा है।

तयोर्हू मैत्रेयी ब्रह्वादिनी बभूवः।

अर्थात्—मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी। ब्रह्मवादिनी का अर्थ बृहदारण्यक उपनिषद् का भाष्य करते हुए श्री शंकराचार्य जी ने ‘ब्रह्मवादन शीला’ किया है। ब्रह्म का अर्थ है—वेद ब्रह्मवादन शील अर्थात् वेद का प्रवचन करने वाली।

यदि ब्रह्म का अर्थ ईश्वर लिया जाए तो भी ब्रह्म प्राप्ति, बिना वेद ज्ञान के नहीं हो सकती। इसलिए ब्रह्म को वही जान सकता है जो वेद पढ़ता है देखिए—

ना वेद विन्मनुते तं वृहन्तम्। तैत्तिरीय.

एतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विवदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन।

-वृहदारण्यक 4।4।2

जिस प्रकार पुरुष ब्रह्मचारी रहकर तप, स्वाध्याय, योग द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते थे, वैसे ही कितनी ही स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रहकर आत्म-निर्माण एवं परमार्थ का संपादन करती थीं।

 

पूर्वकाल में अनेक सुप्रसिद्ध ब्रह्मचारिणी हुई हैं, जिनकी प्रतिभा और विद्वता की चारों ओर कीर्ति फैली हुई थी। महाभारत में ऐसी अनेक ब्रह्यचारिणियों का वर्णन आया है।

भरद्वाजस्य दुहिता रूपेण प्रतिमा भुवि।

श्रुतावती नाम विभोकुमारी ब्रह्मचारिणी।।

-महाभारत शल्य पर्व 47।2

भारद्वाज की श्रुतावती नामक कन्या थी, जो ब्रह्मचारिणी थी। कुमारी के साथ-साथ ब्रह्मचारिणी शब्द लगाने का तात्पर्य यह है कि वह अविवाहित और वेदाध्ययन करने वाली थी।

अत्रैव ब्राह्माणी सिद्धा कौमार ब्रह्मचारिणी।

योग युक्तादिव भाता, तपः सिद्धा तपस्विनी।।

महाभारत शल्य पर्व 54।6

योग सिद्धि को प्राप्त कुमार आस्था से ही वेदाध्ययन करने वाली तपस्विनी, सिद्धा नाम की ब्रह्मणी मुक्ति को प्राप्त हुई।

 

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