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आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना

Adyashakti Gayatri Ki Samarth Sadhana

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आद्यशक्ति गायत्री की समर्थ साधना

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Number of Pages 32
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

भारतीय संस्कृति के बहुमूल्य निर्धारणों, प्रतिपादनों और अनुशासनों का सारतत्व खोजना हो, तो उसे चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र का मंथन करके जाना जा सकता है | भारतीय संस्कृति का इतिहास खोजने से पता लग सकता है कि प्राचीन काल में इस समुंद्र मथन से कितने बहुमूल्य रत्न निकले थे ? भारत भूमि को 'स्वर्गादपि गरीयसी' बनाने में उस मंथन से निकले नवनीत ने कितनी बड़ी भूमिका निबाही थीं | मनुष्य देवत्त्व का उदय कम से कम भारतभूमि का कमलपुष्प तो कहा ही जा सकता है | जब वह फलित हुआ, तो उसका अमर फल इस भारतभूमि को 'स्वर्गादपि गरीयसी' बन सकने में समर्थ हुआ |

 

Product Description

 

भारत को जगदगुरु, चक्रवर्ती -व्यवस्थापक और दिव्य संपदाओं का उदगम कहा जाता है | समस्त विश्व में इसी देश के अजस्त्र अनुदान अनेक रूपों में बिखेरे हैं| यह कहने में कोई अत्युक्ति प्रतीत नहीं होती कि संपदा, सभ्यता और सुसंस्कारिताकी प्रगतिशीलता इसी नर्सरी में जमीं और उसने विश्व को अनेकानेक विशेषताओं और विभूतियों से सुसंपन्न किया |

 

भारतीय संस्कृति का तत्वदर्शन गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षरों की व्याख्या विवेचना करते हुए सहज ही खोजा और पाया जा सकता है | गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री रामायण, गायत्री लहरी आदि संरचनाओं को कुरेदने से अंगारे का वह मध्य भाग प्रकट होता है, जो मुद्यतों से राख की मोटी परत जम जाने के कारण अद्रश्य-अविज्ञात स्थिति में दबा हुआ पड़ा था | कहना न होगा कि गरिमामय व्यक्तित्व ही इस संसार की अगणित विशेषताओं, संपदाओं एवं विभूतियों का मुलभुत कारण है | वह उभरे, तो मनुष्य देवत्व का अधिकाष्ठाता और नर से नारायण बनने की संभावनाओं से भरा-पूरा है | यह गौरव-गरिमा मानवता के साथ किस प्रकार अविच्छिन्न रूप से जुडी रहे, इसका सारतत्व गायत्री महामंत्र के अक्षरों को महासमुद्र मानकर उसमेंडुबकी लगाकर खोजा, देखा और पाया जा सकता है |

 

मात्र अक्षर दुहरा लेने से तो स्कूली बच्चे प्रथम कक्षा में ही बने रहते हैं | उन्हें भी प्रशिक्षित बनने के लिए वर्णमाला, गिनती जैसी प्रथम चरणों से आगे बढ़ना पड़ता है | इसी प्रकार गायत्री मंत्र के साथ जो विभूतियाँ अविच्छित्र रूप से आबद्ध हैं, उन्हें मात्र  थोड़े से अक्षरों को याद कर लेने या दुहरा देने से वर्णित विशेषताओं को उपलब्ध नहीं माना जा सकता | उसमें सन्निहित तत्वज्ञान पर भी गहरी द्रष्टि डालनी होगी | इतना ही नहीं, उसे ह्रदयगम भी करना होगा और जीवनचर्या में नवनीत को इस प्रकार समाविष्ट करना होगा कि मलिनता का निराकरण तथा शलीनता का अनुभव संभव बन सके |

 

संसार में अनेक धर्म संप्रदाय हैं, उनके अपने-अपने धर्मशास्त्र हैं | उनमें मनुष्य को उत्कृष्टता का मार्ग अपनाने के लिए प्रोत्साहन दिया गया है और समय के अनुरूप अनुशासन का विधान किया गया है | भारतीय धर्म में भी वेदों की प्रमुखता है | वेद चार हैं | गायत्री मंत्र के तीन चरण और एक शीर्ष मिलने से चार विभाग ही बनते हैं | एक-एक विभाग में एक वेद का सार तत्व है | आकार और विवेचना की द्रष्टि से अन्यान्य धर्मकाव्यों  की तुलना में वेद ही भारी पड़ते हैं | उनका सारतत्व गायत्री के चार चरणों में है, इसलिए उसे संसार का सबसे छोटा धर्मशास्त्र भी कह सकते हैं | "हाथी के पैर में अन्य सब प्राणियों के पदचिन्हसमा जाते हैं" वाली उक्ति यहाँ भली प्रकार लागु होती है |

 

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