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व्यवस्था बुद्धि की गरिमा

Vyavastha Buddhi Ki Garima

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व्यवस्था बुद्धि की गरिमा

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Number of Pages 48
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2006
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

व्यवस्था बनाने व सिखाने के लिए आमतौर से किसी कारखाने, उद्यौग परिसर, विभाग आदि की आवश्यकता पड़ सकती है | वह शिक्षार्थी को उपलब्ध हो ही जाये, यह आवश्यक नहीं | फिर जहाँ प्रबंध करने के लिए पहुँचा गया है, वहाँ आवश्यक साधन एवं सहयोग मिल ही जाये, इसका कोई निश्चय नहीं | ऐसी दशा में यही सबसे सरल पड़ता है की अपने आप में ही व्यस्था प्रक्रिया का अभ्यास किया जाए | अपने शारीर पर अपना पूरा अधिकार है | तनिक सी इच्छा का दबाव देते ही उसे कुछ भी करने के लिए तत्पर किया जा सकता है | शरीर सध गया, तो समझना चाहिए कि सुदृढ़ स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन का आधार स्रोत हाथ लग गया | पैसे का अपव्यय न हो, तो काम कमाने वाला व्यक्ति भी आय के अनुरूप व्यय का बजट बनाकर काम चलाता और सुखी-संतुष्ट रह सकता है | समय की बरबादी न हो तो योग्यता, सम्पदा और साधनों के उपार्जन में आश्चर्यजनक सफलता मिल सकती है | विचारों का उत्पादन हम स्वं करते हैं उनकी लगाम पूरी तरह अपने हाथ में है | इस बहुमूल्य पूंजी को अस्त-व्यस्त रूप में बिखेरने के स्थान पर यदि उन्हें किन्हीं रचनात्मक कामों मेंलगाते रहा जाये, तो कोई भी व्यक्ति अपने अभीष्ट प्रयोजन में आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है |

 

Product Description

 

व्यवस्था बुद्धि के विकास के मूलभूत आधार

 

आत्मविस्तार के क्रम में प्रथम शारीर, द्वितीय चिंतन, तीसरे उपयोग में आने वाले साधनों की बारी आती है | इन तीनों के आधार पर लोग बड़े बनते और बड़े काम संपन्न करते हैं | यही गुण-कर्म-स्वभाव में परिलक्षित होते हैं |

 

गुण-कर्म-स्वभाव को सुसंस्कृत बना लेना ऐसी, बड़ी जादुई सफलता है, जिसके सहारे शत्रुता बरतने वालों को ठंढा और अन्यमनस्क लोगों को मित्रों में परिणित किया जा सकता है | दुर्गुनी व्यक्ति अपने समर्थक, प्रशंसक, सहयोगी घटाता जाता है | विरोधी बढ़ते जाते हैं | ऐसी दशा मैं मनुष्य घाटे में ही रहता है | आग जहाँ भी रहती है सर्वप्रथम उसी को जलाती है | दुर्गुणों के सम्बम्ध में भी यही बात है | भले ही वे प्रत्यक्षतः किसी को उतनी बड़ी हानी न कर सकते हों, पर उससे विरोध, बैर भाव का वातावरण तो बनता ही है | इनसे किसी को भी कुछ लाभ नहीं है |

 

अव्यवस्थित वाणी सबसे अधिक खतरनाक है | निंदा-चुगली से अन्य लोगों के प्रति तो विद्वेष पैदा होता ही है, साथ ही लोगों को यह भी अनुभव होने लगता है की अपनी कही बात इसके पेट में पच जाने पर इधर-उधर फैले बिना रहेगी नहीं | इस आशंका केकारण उसे अविश्वासी बनकर रहना पड़ता है और कोई स्वजन भी उसके सामने पेट खोलकर बात नहीं करता |

 

क्रोध, आवेश के द्वारा होने वाली क्षति का हाथों-हाथ दुष्परिणाम देखा जा सकता है | कटु वचन कहते देर नहीं होती की प्रत्युत्तर और भी बड़े रूप में सामने आने लगता है | कई बार तो कटु वचनों का प्रभाव इतना भयंकर होता है की वह स्थायी जड़ जमा लेता है और समय आने पर प्रतिशोध का सर्प बनकर डसता रहता है | द्रौपदी द्वारा दुर्योधन को कहे गए व्यंग्य वचन, कालांतर में महाभारत जैसे महाविनाश के निमित्तकारण बने |

 

शिष्टता और शालीनता का ध्यान रखकर बोली गई वाणी सदा नम्रता और मधुरता से भरी-पूरी ही होती है | उसका प्रभाव बदले हुए तेवरों को यथा स्थान लाने में समर्थ होता है | मधुरभाषी लोग वैमनस्य को शांत करते और सदभावना का नए सिरे से शुभारम्भ करते देखे गए हैं | इस बुराई को छोड़ देना और उसे अच्छाई के रूप में बदल लेना यह कुछ ही दिनों के अभ्यास पर निर्भर है | अपने आप पर नम्रता का आरोपण करते हुए, दूसरों को मानवोचित सम्मान प्रदान करते हुए, सोच-समझकर बिना उतावली अपनाये बोला जाये, तो उसका सत्परिणाम सुखद प्रतिक्रिया के रूप में परिलक्षित होता देखा जा सकेगा | शिष्टता, सज्जनता, मधुरता जैसी विशेषताओं से सम्भाषण कर सकना थोड़े दिनों के अभ्यास पर निर्भर है | कटु वचनों को सर्प के दाँत और बिच्छु के डंक के समतुल्य माना जाये, तो कुछ अत्युक्ति न होगी | जिनमें यह दुर्गुण थोड़े अंशों में भी स्वभाव का अँग बन गया हो, उन्हें उसका निराकरण करने के लिए तत्काल प्रबल आरम्भ कर देना चाहिए | यह कौए का कोयल में, कोयल में, बगुले का हंस में कायाकल्प हो जाने जैसी कहावत का प्रत्यक्ष दर्शन है |

 

अव्यवस्था का दूसरा नाम है -- असंयम | अनुशासनहीनता और उच्छन्र्ख्लता भी इसी को कहते हैं | यही कभी अराजकता जैसी दुर्गन्ध और दूरगामी दुष्परिणाम उत्पन्न कराती देखी गई है | असंयम का सवरूप होता है -- उपलब्ध उपयोगी वस्तुओं को निरर्थक या हानिकर प्रयोजनों में बिखेर देना | इसे स्वेच्छापूर्वक लुटेरों का शिकार होने जैसीमूर्खता भी कहा जा सकता है |

 

असंयमों में चार प्रमुख हैं --(१) इन्द्रिय असंयम, (२) समय असंयम, (३) अर्थ असंयम, (४) विचार असंयम | समझा जाना चाहिए कि ये चारों ईश्वरप्रदत्त अति महत्वपूर्ण शक्तियों को बड़े छिद्रों वाले फूटे घड़े में डालकर बहा देने के समान है | यदि इन छिद्रों को बंद कर दिया जाये, तो दैवी अनुकम्पा की तरह निरंतर बरसती और अन्तराल के उदगम में उभरती रहने वालीक्षमताओं के भंडार किसी भी व्यक्ति को अति समर्थ एवं असाधारण कार्य कर सकने योग्य बना सकते हैं |

 

देखा यह जाता है की सामान्य जन, चटोरेपन की आदतों में रहकर अपना स्वास्थ्य खोखला कर लेते हैं | दुर्बल और रोगी रहकर अकाल म्रत्यु मरते है | यदि जिह्वा और जननेंद्रिय को संयम में रखा जा सके, तो शरीर समर्थ एवं मन समुन्नत स्तर का बना रहेगा अर्थसंयम रखा जाये-सादा जीवन उच्च विचार की निति का परिपालन किया जाये-औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपनाया जाये, तो ईमानदारी से सिमित आजीविका कमाते हुए भी व्यक्ति सुखी और संतुष्ट रह सकता है |

 

समय ही जीवन है | एक-एक क्षण लो बहुमूल्य मणि मुक्तक मानकर सदुपयोग करते रहा जाये, तो व्यक्ति एक ही जीवन में कई जीवनों के बराबर महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है | व्यस्त रहने वालों को न तो खुराफातें सूझती हैं और न कुसँग में पड़कर दुर्व्यसन सीखने कीसम्भावना रहती है |

 

विचारों की शक्ति असाधारण है | यदि मस्तिष्क में कल्पनाएँ, आकांक्षाएँ, योजनायें उच्चस्तरीय बनती रहें, तो पतन की आशंका समाप्त होगी और सर्वतोमुखी अभ्युदय की पृष्ठभूमि बनती चलेगी | विचार ही व्यक्ति को ऊँचा उठाते हैं, आवश्यक संपर्क बनाते और साधन जुटाते हैं | उन चारों का असंयम ही व्यक्ति की अगणित क्षमताओं का अपहरण कर लेता है | इन्हें बचाया जा सके, तो समझना चाहिए कि लुट जाने वाला वैभव अपने ही हाथों में रह गया |

 

व्यवस्था बनाने व सिखाने के लिए आमतौर से किसी कारखाने, उद्यौग परिसर, विभाग आदि की आवश्यकता पड़ सकती है | वह शिक्षार्थी को उपलब्ध हो ही जाये, यह आवश्यक नहीं | फिर जहाँ प्रबंध करने के लिए पहुँचा गया है, वहाँ आवश्यक साधन एवं सहयोग मिल ही जाये, इसका कोई निश्चय नहीं | ऐसी दशा में यही सबसे सरल पड़ता है की अपने आप में ही व्यस्था प्रक्रिया का अभ्यास किया जाए | अपने शारीर पर अपना पूरा अधिकार है | तनिक सी इच्छा का दबाव देते ही उसे कुछ भी करने के लिए तत्पर किया जा सकता है | शरीर सध गया, तो समझना चाहिए कि सुदृढ़ स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन का आधार स्रोत हाथ लग गया | पैसे का अपव्यय न हो, तो काम कमाने वाला व्यक्ति भी आय के अनुरूप व्यय का बजट बनाकर काम चलाता और सुखी-संतुष्ट रह सकता है | समय की बरबादी न हो तो योग्यता, सम्पदा और साधनों के उपार्जन में आश्चर्यजनक सफलता मिल सकती है | विचारों का उत्पादन हम स्वयं करते हैं उनकी लगाम पूरी तरह अपने हाथ में है | इस बहुमूल्य पूंजी को अस्त-व्यस्त रूप में बिखेरने के स्थान पर यदि उन्हें किन्हीं रचनात्मक कामों मेंलगाते रहा जाये, तो कोई भी व्यक्ति अपने अभीष्ट प्रयोजन में आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है |

 

दूसरों को समझाना, संभालना, सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपने सुधार-परिष्कार में तो मनोबल की कमी के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं हो सकती | जिस वातावरण में हम रहते हैं, वह अपना ही चुना और पसंद किया हुआ है | यदि उत्कंठा हो तो उसे पूरी तरह बदला जा सकता है | जिस प्रकार पिछले दिनों हेय स्तर का संपर्क साधा और प्रगतिपथ पर बढ़ चलने के लिए उत्साहवर्द्धक वातावरण में प्रवेश किया जा सकता है | परिष्कृत व्यक्तित्व और वातावरण के साथ जुट जाना ही अभ्युदय की अनेकानेकसंभावनाओं से भरा-पूरा रहना है |

 

काम में आने वाली वस्तुओं को भी अपने लिए परीक्षा के प्रश्नपत्र  मानकर चलाना चाहिए, जो सदा यह देखती रहती हैं की हमें संभलकर-संजोकर ठीक तरह देखा गया या नहीं ? जिनकी उपेक्षा की गई है, वे कुरूप लगेगें और समय से पहले ही समाप्त होकर पलायन कर जायेंगे | इसके विपरीत यदि उन्हें सम्मान दिया गया है, सँभालकर सम्मानपूर्वक यथास्थान रखा गया है, तो बदले में वे हाथों हाथ उसे सदाशयता का प्रतिफल प्रदान करेंगे | लोगों की आँखों में सुसंस्कारिता-कलाकारिता की छाप बिठायेंगे | बाहर वाले उस स्थान में प्रवेश करते ही यह अनुभव करेंगे की यहाँ कोई सभ्य, सुसंस्कृत एवं कलाकारिता की छाप बिठायेंगे | बाहर वाले उस स्थान में प्रवेश करते ही यह अनुभव करेंगे कि यहाँ कोई सभ्य, सुसंस्कृत एवं कलाकार स्तर का व्यक्ति निवास करता है | इसके विपरीत बिखरी हुई बेतरतीब पड़ी वस्तुएं हर किसी से यह चुगली कराती हैं कि जिसके यंहा वह आया है वह आदत में फूहड़ किस्म का और सभ्यता कि कसौटी पर अनगढ़ किस्म स्तर का है | भले ही वह पैसे वाला हो या अधिक पढ़ा-लिखा ही क्यों न हो |

 

परिवार में कई सदस्य रहते हैं | उन सभी को साफ-सुथरा और कायदे का बनाना पड़ता है | उनमें से कुछ ही बेशुर होते और आने वाले पर पूरे परिवार के सम्बन्ध में बुरी छाप छोड़ते हैं | ठीक उसी प्रकार यदि प्रयोग में आने वाली वस्तुएँ अस्वच्छ एवं अव्यवस्थित स्थिति में रखी हुई है, तो वे निर्जीव होते हुए भी सजीव मुखर लोगों की तरह से इशारे में सारी पोल खोलकर रख देंगी | धन, पद और शिक्षा आदि के आधार पर बड़प्पन की छाप डालने की जो कोशिश की गई थी, उस पर पानी फिर जाऐगा | मैली-कुचैली, अस्त-व्यस्त, टूटी-फूटी, बेसिलसिले रखी हुई वस्तुएँ घर में रहने वालों के घटिया स्वभाव और व्यवस्था बुद्धि से अपरिचित होने का इज़हार कराती हैं | स्वयं ही अपने आप को अपेक्षित अनुभव कराती हैं और वहां से जल्दी ही कहीं चले जाने का मन बनाती हैं | भले ही वे किसी और के हाथ में पड़ें या कबाड़ी की दुकान में जाकर आधे चौथाई दाम में बिकें | अनेक लोग पुरानी वस्तुओं को गँवाते और नई खरीदते रहने में इतना पैसा लुटाते हैं, जिसकी बचत से कितनी ही उपयोगी एवं आवश्यकवस्तुएँ खरीदी जा सकती थीं |

 

सभ्यता का पहला शिक्षण यही है कि अपने घर में रखी जाने वाली वस्तुओं में से प्रत्येक को सही प्रकार से, सुनियोजित और सुव्यवस्थित ढंग से सजाकर रखा जाए | यदि यह सब सिखा जा सके तो समझना चाहिए कि व्यवस्था बुद्धि में एक महत्वपूर्ण मंजिल पर कर ली | अध्यांम का क, , , यहीं से आरम्भ हुआ समझना चाहिए | एक सुव्यवस्थित व्यक्ति ही श्रेष्ठ साधक बन सकता है

 

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