समझदारों की नासमझी
Quick Overview
मनुष्य की प्रधान विशेषता उसकी विचारशीलता है | इसी आधार पर उसकी विचारणा, कल्पना, विवेचना, धारणा का विकास होता है | अन्य प्राणियों की विचार परिधि पेट प्रजनन, आत्मरक्षा जैसे प्रयोजनों तक सिमित रहती है | वे इसके आगे बढ़कर विश्व व्यवस्था, निजी जीवनचर्या, भावी सम्भावना आदि के सम्बद्ध में कुछ सोच नहीं पाते, अधिक सुविधा पाने और प्रतिस्पर्द्धा का आक्रमण करने जैसा आवेश भी यदाकदा उभरते रहते हैं | ज्यों-त्यों करके समय बिताते हैं और नियतिक्रम के अनुसार मृत्यु के मुख में चले जाते हैं |
मनुष्य को भगवान ने ऐसा विकसित मनःसंस्थान दिया है, जिसके सहारे वह बहुत कुछ सोच सकता है | भूतकालीन घटनाओं से अनुभव सम्पादित करता है, वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भरन्सक प्रयत्न करता है | भविष्य को अधिक सुखद-समुन्नत बनाने के लिए भी प्रयत्न करता है, निति और सुविधाएँ सँजोने, प्रगति के आधार खड़े करने के लिए जो कुछ बन पड़ता है सो करता है | इन्हीं मानसिक विशेषताओं के कारण उसमें संकल्पशक्ति, इच्छाशक्ति, साहसिकता, तत्परता आदि विशेषताओं का अभिवर्धन हुआ है, वह अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुविकसित बन सका है |
Product Description
१. बुद्धिमान की मूर्खता
२. धन की अनावश्यक संचय और अपव्यय
३. शिक्षा के सन्दर्भ में उपेक्षा क्यों बरतें ?
४. नाव में वज़न बढ़ाते चलने की मूर्खता
५. सम्पन्नता नहीं महानता
६. नारी भार बनकर न रह
७. विभेद और विभाजन की दुःखद दीवारें
८. भाग्य और ग्रहगोचर
९. विभेद और बिलगाव देर तक नहीं टिकेंगे
१०. समझदार इतना तो समझें ही
मनुष्य की प्रधान विशेषता उसकी विचारशीलता है | इसी आधार पर उसकी विचारणा, कल्पना, विवेचना, धारणा का विकास होता है | अन्य प्राणियों की विचार परिधि पेट प्रजनन, आत्मरक्षा जैसे प्रयोजनों तक सिमित रहती है | वे इसके आगे बढ़कर विश्व व्यवस्था, निजी जीवनचर्या, भावी सम्भावना आदि के सम्बद्ध में कुछ सोच नहीं पाते, अधिक सुविधा पाने और प्रतिस्पर्द्धा का आक्रमण करने जैसा आवेश भी यदाकदा उभरते रहते हैं | ज्यों-त्यों करके समय बिताते हैं और नियतिक्रम के अनुसार मृत्यु के मुख में चले जाते हैं |
मनुष्य को भगवान ने ऐसा विकसित मनःसंस्थान दिया है, जिसके सहारे वह बहुत कुछ सोच सकता है | भूतकालीन घटनाओं से अनुभव सम्पादित करता है, वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भरन्सक प्रयत्न करता है | भविष्य को अधिक सुखद-समुन्नत बनाने के लिए भी प्रयत्न करता है, निति और सुविधाएँ सँजोने, प्रगति के आधार खड़े करने के लिए जो कुछ बन पड़ता है सो करता है | इन्हीं मानसिक विशेषताओं के कारण उसमें संकल्पशक्ति, इच्छाशक्ति, साहसिकता, तत्परता आदि विशेषताओं का अभिवर्धन हुआ है, वह अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुविकसित बन सका है |
इसके साथ ही एक भौतिक दुर्गुण भी है कि समीपवर्ती वातावरण में जो कुछ होता दिखता है उसी के अनुसरण का अभ्यासी बन जाता है | जिन लोगों से घिरा रहता है उनकी मान्यताओं को, क्रियाओं को अपने में उतार लेता है, इस अनुकरंप्रियता का दबाव इस सीमा तक आवेश के तरह चलता है कि उसे उचित अनुचित का ध्यान नहीं रहता | अन्धानुकरण करने का अभ्यास बन जाता है-यह अन्धानुकरण करने के लिए उसकी प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है | वह परिपक्व होते होते आदत, मान्यता आदि का रूप धारण कर लेती है | कई बार तो वह अनुपयुक्त होते हुए भी इतना दुराग्रही हो जाता है कि उसके विपरीत वाले पक्ष को समझने तक की इच्छा नहीं होती वरन पूर्वाग्रह के आधार पर विरोध चल पड़ता है | आमतौर से विग्रह गलतफहमियों के कारण उठते और खड़े होते हैं | यदि नीर क्षीर विवेक की समझ कम करें तो उन विरोध-विग्रहों में से अधिकांश का समाधान हो जाता है जो आये दिन मनुष्यों के बहुमूल्य समय, श्रम और साधनों को बर्बाद करते रहते
हैं |
निष्कर्ष निर्धारण भी मनुष्य ने कम नहीं निकाले हैं, खोजें भी बहुत की हैं, अविज्ञात को भी विज्ञात में बदला है | इतने पर भी देखा जाता है कि भान्तियाँ कम नहीं हुईं, जिन मान्यताओं को अपनाकर लोग अपना स्वभाव बनाते और आचरण करते हैं उनमें से अधिकांश ऐसे होते हैं जिनके औचित्य पर संदेह किया जा सकता है- समझदारी का दावा करने वालों को नासमझ ठहराया जा सकता है |
लोगों कि मान्यताओं और आदतों का वर्गीकरण-विश्लेषण किया जाये तो उसका प्रतिफल यह सामने आता है कि मनुष्य जितना विचारशील है उसके अधिक अंध विश्वासी है | जितना उसमें ज्ञान है उसकी तुलना में अज्ञान और भी अधिक चढ़ा रहता है | इस दृष्टि से अन्य जीव जन्तु कहीं अच्छे हैं जो भले बुरे के, ज्ञान अज्ञान के झंझट में नहीं पड़ते और प्रकृति प्रेरणा के अनुसार अपने जीवन की गाड़ी किसी प्रकार चलाते रहते हैं |

