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सतयुग की वापसी

Satyug Ki Vapasi

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सतयुग की वापसी

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Number of Pages 32
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2008
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

इस सदी की समापन वेला में अब तक हुई प्रगति के बाद एक ही निष्कर्ष निकलता है कि संवेदना जहाँ जीवंत-जाग्रत होती है वहाँ स्वतः ही सतयुगी वातावरण विनिर्मित होता चला जाता है | भाव संवेदना से भरे-पूरे व्यक्ति ही उस रीती-निति को समझ पाते हैं, जिसके आधार पर संपदाओं का, सुविधाओं का सदुपयोग बनपाता है |

 

समर्थता, कुशलता और सम्पन्नता की आए दिनों जय-जयकार होती देखी जाती है | यह भी सुनिश्चित है कि इन्हीं तीन क्षेत्रों में फैली अराजकता ने वे संकट खड़े किये हैं, जिनसे किसी प्रकार उबरने के लिए व्यक्ति और समाज छटपटाता रहा है | इन तीनों से ऊपर उठकर एक चौथी शक्ति है - भाव संवेदना | यही दैवी अनुदान के रूप में जब मनुष्य की स्वच्छ अंतरात्मा पर उतरती है तो उसे निहाल बनाकर रख देती है | इस एक के आधार पर ही अनेकानेक दैवी तत्व उभरते चले जाते हैं |

सतयुग की वापसी इसी संवेदना के जागरण, करुणा के उभार से होगी | बस एक ही विकल्प इन दिनों है - भाव संवेदना का जागरण | उज्जवल भविष्य का यदि कोई सुनिश्चित आधार है तो वह एक ही है कि जन-जन की भाव संवेदनाओं को उत्कृष्ट आदर्श और उदात्त बनाया  |  

 

Product Description

 

क्रौंच पक्षी को आहत- विलाप करते देखकर वाल्मीकि की करुणा जिस क्षण उभरी, उसी समय वे आदि कवि के रूप में परिणत हो गए | ऋषियों के अस्थि- पंजरों की पर्वतमाला देखकर राम की करुणा मर्माहत हो गई और उनसे भुजा उठाकर यह प्रण करते ही बन पड़ा कि "निशिचर हिन् करौं माहि" | बाढ़, भूकंप, दुर्भिक्ष, महामारी जैसे आपत्तिकाल में जब असंख्यों को देखा जाता है, तो निष्ठुर भले ही मूकदर्शक बने रहें, सह्र्द्यों को तो अपनी सामर्थ्य भर सहायता के लिए दौड़ना ही पड़ता है इसके बिना उनकी नर-पिशाच कहते हैं, उनका मनुष्य समुदाय में भी अभाव नहीं है |

विकास की अंतिम सीढ़ी भाव संवेदना को मर्माहत कर देने वाली करुणा के विस्तार में ही है | इसी को आंतरिक उत्कृष्टता भी कहते हैं | संवेदना उभरने पर ही सेवा साधना बन पड़ती है | धर्म धारणा का निर्वाह भी इससे कम में नहीं होता | तपश्चर्या और योग साधना का लक्ष्य भी यही है कि किसी प्रकार संवेदना जगाकर उस देवत्व का साक्षात्कार हो सके, जो जरुरतमंदों को दिए बिना रह ही नहीं सकता | देना ही जिनकी प्रकृति और नियति है, उन्हीं को इस धरती पर देवता कहा जाता है | उन्हीं का अनुकरण और अभिनंदन करते विवेकवान, भक्तजन देखे जाते हैं |

देनी की प्रकृति वाली आत्माओं का जहाँ संगठन-समन्वय होता रहता है, उसी क्षेत्र को स्वर्ग के नाम से सम्भोधित किया जाने लगता है | इस प्रकार का लोक स्वर्ग के नाम से सम्भोधित किया जाने लगता है | इस प्रकार का लोक या स्थान कहीं भले ही न ही, पर सत्य है की सह्रदय, सेवाभावी, उदारचेता न केवल स्वयं देवमानव होते हैं, वरन कार्यक्षेत्र को भी ऐसा कुछ बनाए बिना नहीं रहते जिसे स्वर्गोपम अथवा सतयुग का सामायिक संस्करण कहा जा सके |

अपने समय को अभूतपूर्व प्रगतिशीलता का युग कहा और गर्वोक्तियों के साथ बखाना जाता है | इस अर्थ में बात सही भी है कि जितने सुविधा साधन इन दिनों उपलब्ध हैं, इतने इससे पहले कभी भी हस्तगत नहीं हो सके | जलयान, वायुयान, रेल, मोटर जैसे द्रुतगामी वाहन, तार, रेडियो, फिल्म, दूरदर्शन जैसे संचार साधन, इससे पूर्व कभी कल्पना में भी नहीं आए थे | कल-कारखानों का पर्वताकार उत्पादन, सर्जरी-अंग प्रत्यारोपण जैसी सुविधाएँ भूतकाल में कहाँ थी ? कहा जा सकता है किविज्ञान ने पौराणिक विश्वकर्मा को कहीं पीछे छोड़ दिया है |

 

बुद्धिवादी की प्रगति भी कम नहीं हुई है | ज्ञान, पुरातन एकाकी धर्मशास्त्र की तुलना में अब अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञानिक शास्त्र जैसे अनेकानेक कलेवरों में असाधारण रूप से बढ़ा और भविष्य में और भी अधिक खोज लेने का दावा कर रहा हैं | शोध संस्थानों की, प्रयोगशालाओं की उपलब्धियाँ घोषणा कर रही हैं कि निकट भविष्य में मनुष्य इतना अधिक ज्ञान, विज्ञान खोज लेगा कि पुरातन काल की समस्त उपलब्धियों को उसके सामने बौना ठहराया जा सके | जाये इसी से यह विश्व उद्यान हरा-भरा, फला-फूला व संपन्न बन सकेगा |

 

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