सामाजिक, नैतिक एवं बौद्धिक क्रान्ति कैसे?
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आज का मनुष्य अधिक सुविधा व साधन संपन्न है | इतना अधिक कि २०० वर्ष पूर्व का मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था | वैज्ञानिक क्रान्ति व आर्थिक क्रान्ति ने साधनों के अम्बार जुटा दिए हैं, फिर भी मनुष्य पहले की तुलना में स्वयं को अभावग्रस्त, रुग्ण, चिंतित व एकाकी ही अनुभव कर रहा है | सुख- संतोष की दृष्टि से वह पहले की अपेक्षा और अधिक दीन-दुर्बल हो गया है | शारीरिक आंतरिक उल्लास की दृष्टि से मनुष्य जाति समग्र विश्व में नई-नई समस्याओं से घिर गयी है | परम पूज्य गुरुदेव इन सभी समस्याओं के मूल में उल्टी बुद्धि का नृत्य ही देखते हैं | दुर्मतिजन्य दुर्गति ही चारों और दिखाई देती है एवं यह दुर्बुद्धि भावनात्मक स्तर पर एक विचार क्रान्ति के बिना ठीक होगी नहीं, उनका वाङ्मय के इस खण्ड में अभिमत है |
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