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इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य (द्वितीय खण्ड)

Ikksavi Sadi Banam Ujjwal Bhavishya - Part 2

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इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य (द्वितीय खण्ड)

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Additional Information

Number of Pages 56
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2007
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

काल चक्र स्वभावत: परिवर्तनशील है। जब कोई बड़ा परिवर्तन, व्यापक क्षेत्र में तीव्र गति से होता है, तो उसे क्रांति कहते हैं। क्रांतियों के बीच कुछ महाक्रांतियाँ भी होती हैं, जो चिरकाल तक जन मानस पर अपना प्रभाव बनाए रखती हैं। प्रस्तुत युग संधि काल भी एक महाक्रांति का उद्घोषक है। महाक्रांतियाँ केवल सृजन और संतुलन के लिए ही उभरती हैं।

 

महाकाल का संकल्प उभरता है तो परिवर्तन आश्चर्यजनक रूप एवं गति से होते हैं। रावण दमन, राम राज्य स्थापना एवं महाभारत आयोजन पौराणिक युग के ऐसे ही उदाहरण हैं। इतिहास काल में बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन, साम्यवाद और प्रजातंत्र की सशक्त विचारणा का विस्तार, दास प्रथा की समाप्ति आदि ऐसे ही प्रसंग हैं, जिनके घटित होने से पूर्व कोई उनकी कल्पना भी नहीं कर सकता था।

 

युग सन्धि काल में, श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों की स्थापना तथा अवांछनीयताओं के निवारण के लिए क्रांतियाँ रेलगाड़ी के डिब्बों की तरह एक के पीछे एक दौड़ती चली आ रही हैं। उनका द्रुतगति से पटरी पर दौड़ना, हर आँख वाले को प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होगा। मनीषियों के अनुसार उज्जवल भविष्य की स्थापना के इस महाभियान में भारत को अति महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।

Product Description

 

विभीषिकाओं के अंधकार से झाँकती प्रकाश किरणें

 

इन दिनों जिधर भी दृष्टि डालें, चर्चा परिस्थितियों कि विपन्नता पर होती सुनी जाती है। कुछ तो मानवी स्वभाव ही ऐसा है कि वह आशंकाओं,विभिषिकाओं को बढ़-चढ़कर कहने में सहज रुचि रखता है। कुछ सही अर्थों में वास्तविकता भी है, जो मानव जाति का भविष्य ने विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण प्रगति कर दिखाई है। बीसवीं सदी के ही विगत दो दशकों में इतनी तेजी से परिवर्तन आए हैं कि दुनियाँ की काया पलट हो गई सी लगती है।सुख साधन बढ़े हैं, साथ ही तनाव-उद्विग्नता, मानसिक संक्षोभ-विक्षोभों में भी बढ़ोत्तरी हुई है। व्यक्ति अंदर से अशांत है।ऐसा लगता है कि भौतिक सुखों की मृग तृष्णा में वह इतना भटक गया है कि उसे उचित-अनुचित, उपयोगी-अनुपयोगी का कुछ ज्ञान नहीं रहा। वह न सोचने योग्य सोचता व न करने योग्य करता चला जा रहा है। फलतः संकटों के घटाटोप चुनौती बनकर उसके समक्ष आ खड़े हुए हैं।

 

हर व्यक्ति इतनी तेजी से आए परिवर्तन एवं मानव मात्र के, विश्व मानवता के भविष्य के प्रति चिंतित है। प्रसिद्ध चिंतक भविष्य विज्ञानी श्री एल्विनटॉफलर अपनी पुस्तक 'फ्युचर शॉक' में लिखते हैं कि " यह एक तरह से अच्छा है कि गलती मनुष्य ने ही की, आपत्तियों को उसी ने न्यौत बुलाया एवं वही इसका समाधान ढूँढने पर भी अब उतारू हो रहा है।

 

"टाइम" जैसी प्रशिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका प्रतिवर्ष किसी व्यक्ति को 'मैन आफ द इयर' चुनती है। सन् ८८ के लिए उस पत्रिका ने किसी को 'मैन आफ द इयर' न चुनकर,पृथ्वी, को "प्लनेट आफ द इयर" घोषित किया है। यह घोषणा २ जनवरी को की गई जिसमें पृथ्वी को 'एन्डेन्जर्ड अर्थ' अर्थात् प्रदूषण के कारण संकटों से घिरी हुई दर्शाया गया। यह घोषणा इस दिशा में मनीषियों के चिंतन प्रवाह के गतिशील होने का हमें आभास देती है। क्या हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं? यह प्रश्न सभी के मन में बिजली की तरह कौंध रहा है। ऐसी स्थिति में हर विचारशील ने विश्व भर में अपने-अपने स्तर पर सोचा, अब की परिस्थितियों का विवेचन किया एवं भावी संभावनाओं पर अपना मत व्यक्त किया है।यह भी कहा है कि अभी देर नहीं हुई. यदि मनुष्य अपने चिंतन धारा को सही मोड़ दे, तो वह आसन्न विभीषिका के घटाटोपों से संभावित खतरों को टाल सकता है।

 

हडसन इंस्टीट्यूट न्यूयार्क के हरमन कॉन. वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट अमेरिका के लेस्कर आर ब्राउन, जो आँकड़ों के आधार पर भविष्य की रूपरेखा बनाते हैं, आज से ४०० वर्ष पूर्व फ्रांस में जन्मे चिकित्सक नोस्ट्राडेमस, फ्रांस के नार्मन परिवार में जन्में काउन्ट लुई हेमन जिन्हें संसार 'कीरो' के नाम से पुकारता था, क्रिस्टल बॉल के माध्यम से भविष्य का पूर्वानुमान लगाने वाली सुविख्यात महिला जीन डीक्सन तथा क्रांतिकारी मनीषी चिंतक महर्षि अरविंद जैसे मूर्धन्यगण कहते हैं कि यद्यपि यह वेला संकटों से भरी है,विनाश समीप खड़ा दिखाई देता है, तथापि दुर्बुद्धि पर अंततः सद् बुद्धि की ही विजय होगी एवं पृथ्वी पर सतयुगी व्यवस्था आएगी। आसन्न संकटों के प्रति बढ़ी जागरूकता से मनीषीगण विशेष रूप से आशान्वित हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य को बीसवीं सदी के समापन एवं इक्कीसवीं सदी के शुभारंभ वाले बारह वर्षों में, जिसे संधि वेला कहकर पुकारा गया है, अपना पराक्रम-पुरुषार्थ श्रेष्ठता की दिशा में नियोजित रखना चाहिए। शेष कार्य ब्राह्मी चेतना, दैवी विधि-व्यवस्था, महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया उससे स्वयं करा लेगी।

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