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योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा

Yoga Evam Prakritik Chikitsa

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  • Yoga Evam Prakritik Chikitsa

योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा

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Number of Pages 131
Writer’s name ब्रह्मवर्चस्
Edition/Year of Publishing 2007
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name शान्तिकुंज, हरिद्वार

Quick Overview

 

योग सम्बन्धी अनेक विधाओं (लययोग, तपयोग, हठयोग, नादयोग, राजयोग आदि) में राजयोग सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोपयोगी, सुगम प्रचलित विधा माना गया है | पतंजलि योग को ही राजयोग कहा जाता है | इसके आठ अंग हैं | इसे अष्टांगयोग भी कहा गया है | जीवन के समग्र विकास-श्रेष्ठतम तथा साधनामय बनाने के लिए प्रस्तुत पुस्तक में इसका सरल विवेचन किया गया है | (१) यम (२) नियम (३) आसन (४) प्राणायाम (५) प्रत्याहार (६) धारणा (७) ध्यान (८) समाधि | इन आठों में आवश्यक नहीं कि इन्हें एक के बाद ही दूसरे, इस क्रम में प्रयोग किया जाय, बल्कि सबका सम्मिलित  प्रयोग चलता रहना आवश्यक है | जिस प्रकार अध्ययन, व्यायाम, व्यापार, कृषि आदि को एक ही व्यक्ति एक ही समय में योजनाबद्ध तरीके से कार्यान्वित करता रह सकता है | उसी प्रकार राजयोग के अंगों को भी दिनचर्या में उनका स्थान एवं स्वरूप निर्धारित करते हुए सुसंचालित रखा जा सकता है |

 

आमतौर से इस साधना का क्रिया पक्ष ही पढ़ा समझा जाता रहा है | इसके पीछे जुदा हुआ भाव पक्ष उपेक्षित कर दिया जाता है | प्रस्तुत पुस्तक में पतंजलि राजयोग के सभी पक्षों पर तात्विक प्रकाश डाला गया है ; ताकि उसके सर्वांगपूर्ण स्वरूप से अवगत हुआ जा सके |

 

Product Description

 

प्रस्तुत पुस्तक का दूसरा पक्ष है प्राकृतिक चिकित्सा | "शरीर माध्यम खलु धर्म साधनाम" | जीवन को योगमय बनाने के लिए पंचतत्वों से निर्मित शरीर विशेष का महत्व है | यों राजयोग यम, नियम के साथ-साथ आसन- प्राणायाम का विधान, स्वस्थ शरीर और शिवसंकल्पमय मन का संकेत करता है |

 

आधुनिक विज्ञान की प्रगति स्तुत्त्य है | उसने हमें अनेकों अनुदान दिए हैं | चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में निरोग बनाने एवं आयुष्य बढ़ाने सम्बन्धी जितने प्रयोग पिछले दो-तीन दशकों में सारे विश्व में हुए हैं, उतने संभवतः गत पाँच शताब्दियों में भी नहीं हुए, फिर भी क्या कारण है कि मनुष्य अपनी जीवनी शक्ति निरंतर खोता चला जा रहा है | नित नए असाध्य रोगों का शिकार होता जा रहा है | जबकि निरोग जीवन मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है | मनुष्य के लिए ऋषियों का सन्देश है- "जीवेम शरदः शतम " - व्यक्ति सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जीए | सौ वर्ष से भी अधिक जीने वाले, स्वास्थ्य के मौलिक सिद्धांतों को जीवन में उतारने वाले अनेकानेक व्यक्ति कभी वसुधा पर थे एवं इसे एक सामान्य सी बात माना जाता था | तब समय था जब मनुष्य प्रकृति के सन्निकट, प्रकृति की गोद में, प्रकृति के अजस्र अनुदानों का लाभ लेता था | पंच महाभूतों से निर्मित जीवन काया का प्रकृति के अनुशासन में सदुपयोग कर अलौकिक आनंद से भरपूर जीवन जीता था |

 

रोगों की उत्पत्ति की जड़ हमारी जीवनशैली का त्रुटिपूर्ण होना है | हमारी जीवनीशक्ति - प्राण शक्ति यदि अक्षुणं रहे व जीवन शैली स्वाभाविक प्रकृति के अनुशासन में रहे तो हमें कभी रोग-शोक सता नहीं सकते | पंचभूतों से बनी इस काया को जिसे अंत में मिट्टी में ही मिल जाना है, क्या हम पंच भूतों, आकाश, वायु, जल, मिट्टी और अग्नि के माध्यम से स्वस्थ बना सकते हैं, इनका विवेचन प्रस्तुत पुस्तक में दिया गया है | पू. आचार्य श्री (वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी) का कहना है कि प्रगतिशील सभ्यता कि दौड़ में अग्रणी मानव को पीछे की ओर लौटना होगा-उत्तम स्वास्थ्य बिना औषधि के बनाये रखने के लिए उन्होंने चार सूत्र दिए हैं-

 

(१) खाद्य पदार्थों का सही चुनाव, (२) सही खाने का तरीका, (३) समुचित परिश्रम तथा (४) सही सुव्यवस्थित जीवनचर्या | उपवास, शरीर शुद्धि व कायाकल्प के सिद्धांत यंहा विस्तार से समझाया गया है | क़ब्ज मिटाकर मनुष्य कैसे स्वस्थ बना रह सकता है व स्फूर्ति से भरी दिनचर्या कैसे स्वयं बनायीं जाती है, यह सारा विवेचन इसमें है | प्राकृतिक चिकित्सा की सारी धुरी उसी पर केन्द्रित है | वस्तुतः मनुष्य यदि इन सभी बातों का ध्यान रखकर नैसर्गिक जीवनचर्या को अंगीकार कर वैसा ही आहार ले व चिंतन स्वस्थ, मन प्रफुल्लित रखे तो किसी तरह की कोई व्याधि होने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता |

 

प्रस्तुत पुस्तक इसी उद्येश्य से लिखी गयी है कि जन सामान्य स्वयं स्वास्थ्यलाभ ले सकें तथा अपने सम्पर्क क्षेत्र में स्वास्थ्य संवर्धन का सफल प्रयास कर सकें | कुछ ऐसे सूत्र दिए गए हैं जो अनिवार्य तो हैं ही, बिना किसी खर्च के स्वास्थ्य लाभ पाया जा सकता है | प्राकृतिक चिकित्सा की तरफ यदि जन सामान्य को प्रेरित किया जाय तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः हो सकता है |

 

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