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संजीवनी विद्या का विस्तार

Sanjivani Vidya Ka Vistar

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संजीवनी विद्या का विस्तार

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Number of Pages 32
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

आवश्यक-अनावश्यक जानकारियाँ सिर पर लादने और नौकरी स्तर की कुछ आजीविका कमा लेने के लक्ष्य तक सीमित वर्तमान स्कूली शिक्षा अपने ढर्रे पर चलती भी रह सकती हैं | जिन्हें उसमें रूचि हो, वे उसे अपनाए भी रहें, पर उसी को सब कुछ मानकर उसी परिधि में सीमित रहने से काम चलेगा नहीं | अगले दिनों व्यक्ति और समाज को जिस ढाँचे में ढालना है , उसका प्रकाश -आभास भी उसमें कहीं ढूंढे नहीं मिलता | जिस सुधार और सृजन की आवश्यकता पड़ेगी, उसके लिए कोई संकेत तक उसमें नहीं हैं | आज तो सबसे अधिक आवश्यकता उसी की है, जिसको प्राचीन काल से विद्या या मेधा के नाम से जाना जाता है, जो स्वयं ही हर समस्या का निराकरण करने की स्थिति में होती है | अब आगमन -अवतरण उसी का होने जा रहा है |

 

Product Description

 

 

जिन अभिनव जानकारियों और प्रेरणाओं की इन्हीं दिनों आवश्यकता है, उन्हें प्राप्त करने के लिए स्कूलों पर निर्भर नहीं रहा  जा सकता | उनमें एक तो उन विषयों का समावेश ही नहीं है, दुसरे वह पुस्तक -रटन से पूरी भी नहीं हो सकती | उसके लिए प्रत्यक्ष उदाहरणों का प्रेरणापद माहौल सामने रहना चाहिए | विशेषतया अध्यापक इस स्तर के होने चाहिए, जो अपने साँचे में ढालकर छात्रों को प्रतिभावान- प्राणवान बना सकें, जो न केवल स्वयं बने, वरन अपने आलोक से समूचे सम्पर्क क्षेत्र को प्रकाशित कर सकें |

 

प्रज्ञा का अवतरण और विस्तार का कार्य असाधारण रूप से विस्तृत है | उसे शिक्षित-अशिक्षित, नर-नारी, बाल-वृद्ध, स्वस्थ-रोगी सभी को अवगत कराया जाना है | भाषाओं की छोटी -छोटी परिधि में बँटे हुए संसार में रहने वाले ६०० करोड़ मनुष्यों को एक प्रकार से युग चेतना-तंत्र के अंतर्गत प्रशिक्षित किया जाना है| यह योजना इतनी बड़ी होगी कि उसे पूरी करने में कम से कम सौ वर्ष समय और अरबों -खरबों जितना धन जुटाना पड़ेगा | अध्यापक भर्ती और प्रशिक्षित करने पड़ेगें, सो अलग | इसलिए युग शिक्षा का स्वरूप उन आधारों को अपनाते हुए विनिर्मित करना पड़ेगा, जो आज की परिस्थितियों में इन्हीं दिनों कर सकना संभव हो |

 

बड़े प्रयासों की प्रतीक्षा में रुके रहने की अपेक्षा, यही उपयुक्त समझा गया है कि वर्तमान परिस्थितियों में अपने छोटे साधनों से जो संभव हो, उसे तुरंत आरंभ किया जाए और लोगों को देखने दिया जाए कि आरंभ का प्रतिफल किस रूप में उपलब्ध हो रहा है | बात यदि वजनदार होगी, तो लोग अपनाएँगे भी | प्रचलित शिक्षा प्रणाली किसी हद तक अपना अस्तित्व बनाए भी रह सकती है, पर उसकी आड़ में युग- शिक्षण को रोका नहीं जा सकता |

 

युग शिक्षण में यह विषय आवश्यक  है:-(१) व्यक्तित्व का समग्र विकास -परिष्कार | (२) समाज संरचना और उसके साथ जुड़े हुए प्रचलनों का नव निर्धारण | (३) अर्थ व्यवस्था | (४) सुलभ आजीविका कैसे उपलब्ध हो ? (५) मनुष्य के चिंतन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का समावेश किस प्रकार बढ़ता चले ? (६) परिवारों की वर्तमान संरचना में क्या सुधार-परिवर्तन किया जाए ? (७) शारीरिक और मानसिक रुग्णता से सुनिश्चित छुटकारा किस प्रकार मिले ? (८) अवांछनीयता से किस प्रकार निपटा जाए ? (९) अब की अपेक्षा कहीं सुखद और सरल परिस्थतियों का निर्धारण कैसे किया जाए ? (१०) सहकारिता और सदभावना का क्षेत्र कैसे बढ़े ? (११) तत्व दर्शन क्षेत्र में परिष्कार विरोधी मान्यताओं का समीकरण कैसे किया जाए ? (१२) राजतंत्र और धर्मतंत्र की उभयपक्षीय समर्थ शक्तियों को किस प्रकार नए युग के अनुरूप साँचे में ढाला जाए ?

 

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