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शरीर रचना एवं क्रिया विज्ञान

Sharir Rachana Evam Kriya Vigyan

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शरीर रचना एवं क्रिया विज्ञान

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Additional Information

Number of Pages 192
Writer’s name ब्रह्मवर्चस्
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name शान्तिकुंज, हरिद्वार

Quick Overview

 

आयुर्वेद अथवा किसी भी चिकित्सा शास्त्र के अध्ययन के लिए शरीर रचना का ज्ञान नितांत आवश्यक है | चिकित्सा में निपुणता प्राप्त करने के लिए प्रथम और आवश्यक सोपान शरीर विज्ञान है | इस ज्ञान के बिना चिकित्सा, शल्य, शालाक्य, कौमारभृत्य आदि किसी भी आयुर्वेद के अंग का अध्ययन संभव नहीं | चिकित्सा के प्रमुख दो वर्ग है-

 

(१) काय चिकित्सा और (२) शल्य चिकित्सा वर्ग | सर्वप्रथम चिकित्सकों को शरीर विषय का प्रत्यक्ष ज्ञान होना आवश्यक है |

 

Product Description

 

 

 

 

 

संसार के रोग रूपी दुःख को हरण करने वाला आयुर्वेदीय हस्त चिकित्सक वही बन सकता है, जिसने शरीर के अंग-प्रत्यंगों की स्थिति, उनकी परिभाषा, अंग-प्रत्यगों की स्थिति, उनकी परिभाषा, अंग-प्रत्यगों के परस्पर सम्बन्ध, क्रियात्मक शरीर एवं दोषात्मक शरीर ( शरीर संबधी ) का प्रत्यक्ष कर्माभ्यास  द्वारा अध्ययन किया है |

जिस प्रकार रोग की चिकित्सा करने से पहले रोग-निदान विनिश्चय अर्थात रोग निदान आवश्यक होता है | उसी प्रकार शरीर के रोग निदान से पूर्व शरीर विषय का ज्ञान आवश्यक है | कहने का तात्पर्य यह है शरीर के बिना रोग निदान नहीं हो सकता और रोग निदान के बिना चिकित्सा असम्भव है |

शरीर क्रिया विज्ञान चिकित्सा शास्त्र का एक मुख्य आधार है | शरीर रचना शास्त्र तथा विकृत शास्त्र के साथ वह एक त्रिभुज आधार बनता है, जिस पर चिकित्सा शास्त्र आश्रित है | इन तीन विज्ञानों का पूर्ण ज्ञान न होने से जिस पर चिकित्सा शास्त्र आश्रित है | इन तीन विज्ञानों का पूर्ण ज्ञान न होने से चिकित्स का पूर्ण ज्ञान होना ही असम्भव है | शारीरिक अंगों में विकृति आ जाने तथा उनकी क्रियाओं का स्वाभविक रोगों में न होने का नाम है रोग | अतः की रचना और स्वाभाविक क्रिया का समुचित ज्ञान हुए बिना उनकी विकृत दशा का अनुमान ही नहीं किया जा सकता | यही शरीर क्रियाविज्ञान का महत्त्व है |

 

आयुर्वेदीय शरीर की अपनी विशिष्ट मान्यताएँ है, जिन पर आयुर्वेद के अष्टांगों का अस्तित्व आधारित है | ये मान्यताएँ हैं-पंचमहाभूतवाद, त्रिदोश्वाद, ओज, स्वरूप तथा प्रकृति निर्धारण | अन्न तथा धातु पाक के क्रम में अग्नि तथा श्रोतों का महत्व तो है ही | क्रिया शरीर की दृष्टि से शरीर को "दोषधातुमल विज्ञान" कहा गया है | आहार करने पर धातुएँ बनती हैं और मल का निर्हरण हो जाता है और इन दोनों क्रियाओं का संचालन नियमन दोषों से होता है | अतः सूत्र रूप में दोष, धातु और मल शरीर क्रिया के प्रतीक हैं | अतः सूत्र रूप में दोष, धातु और मल शरीर क्रिया के प्रतीक हैं और इसी कारण कुछ लोग आयुर्वेदीय क्रिया शरीर को "दोष - धातुमल  विज्ञान" कहना अधिक पसंद करते हैं | जीवन की दृष्टि से त्रिदोष का सर्वोपरि महत्व है | इसकी सम्यक स्थिति से जीवन के व्यापार ठीक-ठीक चलते हैं, अन्यथा पुरुष अस्वस्थ हो जाता है |

 

शरीर प्रक्रियाओं की व्याख्या में आधुनिक विज्ञान जहाँ विश्लेषनात्मक दृष्टिकोण अपनाता है, आयुर्वेद समस्त पुरुष के संश्लेषात्मक दृष्टि से प्राकृत-वैकृत भावों के व्याख्या करता है | इस कार्य में त्रिदोश्वाद से ही सहायता मिलती है ; क्योंकि त्रिदोष सर्वशरीरचर हैं और समस्त पुरुष को वे प्रभावित करते हैं | इस प्रकार व्यष्टि एवं समष्टि दोनों दृष्टियों का सामंजस्य त्रिदोश्वाद से हो जाता है | इस प्रकार आयुर्वेदीयशरीर को अधिकाधिक सुव्यविस्थत कर सुचारू बनाने का प्रयत्न प्रस्तुत ग्रन्थ में किया गया है |

 

अतः शरीर प्रक्रियाओं की व्याख्या करते समय हमें विज्ञान के भौतिक दृष्टिकोण को शुद्ध रूप में समझना आवश्यक है | प्रस्तुत ग्रन्थ इस दिशा में सहायक होगा, ऐसी आशा करना मेरे लिए स्वाभाविक है | यह "शरीर क्रियाविज्ञान" विद्यार्थियों एवं विषय के जिज्ञासुओं के लिए अतीव उपयोगी सिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं |

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