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निदान चिकित्सा

Nidan Chikitsa

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  • Nidan Chikitsa

निदान चिकित्सा

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Additional Information

Number of Pages 160
Writer’s name ब्रह्मवर्चस्
Edition/Year of Publishing 2007
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name शान्तिकुंज, हरिद्वार

Quick Overview

 

आतुरस्य रोगप्रशमनम इस आयुर्वेद शास्त्र के उद्देश्य की पूर्ति के लिए तीन महत्व के सूत्र ध्यान रखने योग्य हैं १. हेतु ज्ञान अर्थात कारण (निदान) का ज्ञान, २. लिंग ज्ञान अर्थात लक्षण ज्ञान, ३. औषधि ज्ञान अर्थात चिकित्सा ज्ञान |

इन तीन सूत्रों में लिंग ज्ञान सर्वाधिक महत्व का है | शास्त्र वचन है -रोग मादौ  परीक्षेत तानोअनंतर मौषधम | इसी से रोग के स्वरूप का ज्ञान होता है और स्वरूप ज्ञान के पश्चात् ही हेतु और औषध की समीक्षा तथा व्यवस्था करने से रोगी के रोग का निवारण हो पता है और चिकित्सक को निश्चित रूप से चिकित्सा में यश श्री मिलती है |

 

Product Description

 

रोगस्तु दोषवैषम्यं विषम हुए ये दोष जब धातुओं को दूषित करते हैं, तब दोष दुष्य सम्मुर्च्छना हो व्याधि की उत्पत्ति होती है | दोषों को समावस्था में लाना और संप्राप्ति भंग कर व्याधि कानिराकरण  करना ही चकित्सा है | इसलिए दोष विपरीत और व्याधि विपरीत चिकित्सा क्रम में अपनाना पड़ता है | रोगी एवं रोग की परीक्षा के लिए निदान फलक का अनुशीलन अतीव आवश्यक है यह जितना निर्दोष और सटीक होगा रोग विनिश्चित उसी अनुपान में दोष रहित हो सकेगी | रोग का निदान अचूक होने पर चिकित्सा विज्ञान का आविष्कार हुआ है |

 

योग्य द्रव्यों और योग्य क्रमों को अपनाकर चिकित्सा देने पर रोगी रोगमुक्त हो स्वस्थ अचूक होने पर चिकित्सा विज्ञान का आविष्कार हुआ है |

 

चिकित्सक को निदान शास्त्र एवं चिकित्सा विज्ञान का आयुर्वेद परख ज्ञान हो तो आयुर्वेदिक चिकित्सा देने में सरलता हो जाती है | इस उद्देश्य की आंशिक पूर्ति हो सके इस हेतु से, उपर्युक्त सूत्रों को ध्यान में रखते हुए, प्रस्तुत पुस्तक में शरीरस्थ विविध संस्थानों की रचना, क्रिया तथा तज्जन्यमुख्य रोगों का परिचय देते हुए, उनकी चिकित्सा का समयानुकूल संक्षिप्त विवरण देने का प्रयास किया गया है |

 

निदान से चिकित्सा के शिखर तक पहुँचाने में यह पुस्तक प्रथम सोपान का काम कर सकेगी, जिससे आगे बढ़ते हुए,भविष्य में चिकित्सा का अंतिम लक्ष्य प्राप्त करने में जिज्ञासु  सफल हो सकें |

 

इसी आशा और विश्वास से इसका  अनुशील करने वाले अवश्य लाभान्वित होगें | योग्य परामर्श की अपेक्षा रखते हुए उन सभी लेखकों का ह्रदय से आभारी हूँ जिनकी पुस्तकों या लेखों से इन पुस्तक के लेखन कार्य में सहयोग प्राप्त हुआ है |

 

                      

१ प्रथमोअध्याय:

निदान पंचक

(निदान,पूर्वरूप,रूप,उपयश,संप्राप्ति)

हेतु निरूपण, पूर्वरूप ,रूप

उपशय

(चिकित्सा और उपशय में भेद, अनुपशय)

संप्राप्ति के छः: भेद

(उपद्रव के लक्षण, सध्यासाध्य विचार )

२ द्वितीयोअध्याय:

षडविध, क्रियाकाल

(संचय, प्रकोप,प्रसर, स्थान संश्रय, व्यक्त, भेद)

दोष वैषम्य

विकास क्रम सारणी

३ तृतीयोअध्याय:

अष्टविध परीक्षा

(नाड़ी, मूत्र, मल, जिह्वा, शब्द, स्पर्श, नेत्र, आकृति,)

नाड़ी,

मूत्र,

मल (पुरीष),

जिह्वा,

शब्द,

स्पर्श परीक्षा,

 नेत्र,

आकृति

४ चतुर्थोअध्याय:

पाचन संस्थान-

मुख्य अवयव

(मुख, अत्र प्रणाली,

पाकस्थली, पक्काश्य, आँतें, अग्राशय,

क्लोम, यकृत, पित्ताशय, प्लीहा )

५ पंचमोअध्याय:

पाचन तंत्र सम्बन्धी रोग-

विबंध, अजीर्ण, अग्रिमांध,

अतिसार, उदरशूल, वृक्कशूल,

अम्लपित्त, कृमिरोग, अर्श

६ षष्ठोअध्याय:

श्वसन तंत्र, नासा गुहा, कंठ, श्वास नली, श्वसनी, फुफ्फुस

७ सप्तमोअध्याय:

श्वसन सम्बन्धी रोग,

कास, आर्द्रकास, श्वास प्रतिश्याय, राज्यक्ष्मा,

श्वसनक, ज्वर, हिक्का, गिलायु, स्वर भेद

८ अष्टमोअध्याय:

मूत्रवह संस्थान -

अंग -वृक्क, मूत्र प्रणाली, मूत्राशय, मूत्रमार्ग,

९ नवमोअध्याय:

प्रजनन संस्थान के अंग,

अंग-पुरुष प्रजननांग,

स्त्री प्रजननांग

(भग, गर्भाशय, बीजाधार, बीजवाहनियाँ)

१० दशमोअध्याय:

रक्तवह संस्थान के रोग-

ह्रदय की सामान्य रचना एवं कार्य,

पाण्डु रोग,

कामला, हद्रोग

(वातिक, पैत्तिक, कफज,

सत्रिपात, कृमिज, हद्रोग)

रक्तचाव

११ एकादशोअध्याय :

वातवह संस्थान सम्बन्धी विकार-

(संधिवात, आमवात, पक्षाघात)

१२ द्वादशोअध्याय:

मनोविकार (अपस्सार )-

उन्माद, मानसिक तनाव जन्य विकार,

सूर्यावर्त रोग के कारण, शिरो रोग, अर्धाविभेदक, सूर्यावर्त

१३ त्रयोदशअध्याय

नेत्र रोग के सामान्य कारण -

अर्म पोथकी, अन्जनामिका, पक्ष्मसात ,

नक्तांध, नाकुलंध, दिवान्ध्य,

सव्रण शुक्ल एवं अव्रण,

शुक्ल, द्रष्टि दौर्बल्य, तिमिर

१४ चतुर्दशोअध्याय:

कर्णरोग (बाधिर्य, कर्णशूल, कर्णपाक,

कर्णस्राव, कर्णक्ष्वेद )

१५ पंचदशोअध्याय:

नासा रोग (प्रतिश्याय, पीनस )

१६ षोडशोअध्याय:

मुखरोग, दन्तमुल रोग, दंतरोग,

(कृमिदन्त, दंतहर्ष, दन्तशर्करा )

१७ सप्तदशोअध्याय:

कंठ एवं गलरोग,

स्वरभेद ,गलायु

अधिजिह्वका, गलौघ

१८ अष्टादशोअध्याय:

चर्मरोग के हेतु, पामा एवं कच्छू

विचर्चिका, युवान पीडिका,

दद्रु, पाददरी, अहिपूतजा,वृषण कच्छू,

चिप्प एवं कुनख |

१९ ऊनविंशोअध्याय:

संक्रामक रोग या औपसर्गिक रोग-

रोग- सम्प्रप्तिकाल -उपसर्जनकाल,

संक्रमण प्रकार, संक्रमण प्रतिषेधोयाया:

(घोषण, प्रथक्ककरण, उपदेश:, जीवाणु

विनाशनम, शव, विसूचिका) अतिसार,

पक्कातिसार, जीर्णातिसार, रक्ततिसार,

आंत्रशोधज, ज्वरातिसार, बालातिसार, बाल प्रवाहिका,

रोमांतिका, कुछ विशिष्ट संक्रामक रोगों का वर्णन |

२० विंशोअध्याय:

विषम ज्वर के हेतु, मलेरिया, राजयक्ष्मा,

क्षयरोग के प्रसार के कारण, वयस्क लोगों में क्षयरोग होने का कारण |

२१ एकविंशोअध्याय:

एड्स -एड्स परिचय, कारण, लक्षण,

सावधानियाँ एवं बचाव, आपको इन चीजों से एड्स नहीं हो सकता |

पश्चिम का मारक रोग -एड्स चिकित्सा एड्स व शोष रोग के लक्षण सामान हैं-

चिकित्सा स्रायुकरोग, उपदंश रोग, फिरंग

२२ द्वाविंशोअध्याय:

आत्ययिक अवस्थाओं में प्राथमिक उपचार

( प्राथमिक सहायता का क्षेत्र, आवश्यक सावधानियाँ

आवश्यक नियम )

१. अस्थि भग्र

२. अस्थिच्युति (संधि मोक्ष )

३. रक्त स्राव

४. अग्रिदग्ध

५. जल में डूबने की चिकित्सा

६. सर्पदंश

७. पागल कुत्ते काटने पर

८. स्रासाव्रोध

९. विद्युत आघात

१०. आघात (सदमा)

११. व्रणोपचार  

 

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