महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण
Quick Overview
व्यक्तित्व का परिष्कार ही प्रतिभा परिष्कार है | धातुओं की खदानें जहाँ भी होती हैं, उस क्षेत्र के वही धातु कण मिट्टी में दबे होते हुए भी उसी दिशा में रेंगते और खदान के चुंबकीय आकर्षणों से आकर्षित होकर पूर्व सिंचित खदान का भार, कलेवर और गौरव बढ़ाने लगते हैं | व्यक्तित्ववान अनेकों का स्नेह, सहयोग, परामर्श एवं उपयोगी सानिध्य प्राप्त करते चले जाते हैं | यह निजी पुरुषार्थ है | अन्य सुविधा-साधन तो दूसरों की अनुकम्पा भी उपलब्ध करा सकता है, किन्तु प्रतिभा का परिष्कार करने में अपना संकल्प, अपना समय और अपना पुरुषार्थ ही काम आता है | इस पौरुष में कोताही न करने के लिया गीताकार ने अनेक प्रसंगों पर विचारशीलो को प्रोत्साहित किया है | एक स्थान पर कहा गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु और स्वयं ही अपना मित्र है | इसलिए अपने को उठाओ !
Product Description
मनुष्य ने स्रष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में वरिष्ठता पाई है | शरीर-संरचना और मानसिक-मस्तिष्कीय विलक्षणता के कारण उसने स्रष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में ने केवल स्वयं को सशक्त, समुन्नत, सिद्ध किया है; वरन वह ऐसी संभावनाएँ भी साथ लेकर आया है, जिनके सहारे अपने समुदाय को, अपने समग्र, वातावरण एवं भविष्य को भी शानदार बना सके | यह विशेषता प्रयत्नपूर्वक उभारी जाती है | रास्ता चलते किसी गली-कुचे में पड़ी नहीं मिल जाती | इस दिव्य विभूति को प्रतिभा कहते हैं | जो इसे अर्जित करते हैं, वे सच्चे अर्थों में वरिष्ठ-विशिष्ट कहलाने के अधिकारी बनते हैं, अन्यथा अन्यान्य प्राणी तो, समुदाय में एक उथली स्थिति बनाए किसी प्रकार जीवनयापन करते हैं |
मनुष्य, गिलहरी की तरह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता | बंदर की तरह कुलांचे नहीं भर सकता | बैल जितनी भार वहन की क्षमता भी उसमें नहीं है | दौड़ने में वह चीते की तुलना तो क्या करेगा, खरगोश के पटतर भी अपने को सिद्ध नहीं कर सकता | पक्षियों की तरह पानी में डुबकी ही लगा सकता है | अनेक बातों में वह अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत पीछे है, किंतु विशिष्टमात्रा में मिली चतुरता, कुशलता के सहारे वह सभी को मात देता है और अपने को वरिष्ठ सिद्ध करता है |
व्यावहारिक जीवन में मनुष्य अन्य प्राणी-समुदाय की तुलना में अनेक द्रष्टियों से कहीं आगे है, वह उसी की नियति है | अधिकांश मनुष्यों को अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक सुविधा -सम्पन्न जीवन-यापन करते हुए देखा जाता है | इतने पर भी सम्भावना यह भी है कि वह इन उपलब्धियों की तुलना में और भी अधिक समर्थता और महत्ता प्राप्त कर सके | पर शर्त एक ही है कि उस अभिवर्धन के लिए वह स्वयं अतिरिक्त प्रयास करे | कमियों को पूरा करे और जिसकी नितांत आवश्यकता है, उसे पाने-कमाने के लिए अधिक जागरूकतापूर्वक, अधिक तत्परता एवं तन्मयता बरते | अपने पुरुषार्थ को इस स्तर का सिद्ध करे कि यह मात्र दैवी अनुदानों के आधार पर ही समुन्नत बनकर नहीं रह रहा है, वरन उसका निज का पुरुषार्थ भी समुचित मात्र में सम्मिलित रहा है | यह प्रतिभा ही है जिसके बल पर वह अन्यान्यों की तुलना में अधिक सुसंस्कृत और समुन्नत बनता है | गोताखोर गहरी डुबकी लगाकर मोती बीनते हैं | हीरे खोजने वाले खदान का चप्पा -चप्पा ढूंढ़ डालते हैं | प्रतिभा को उपलब्ध करने के लिए भी इससे कम प्रयास से काम नहीं चलता |

