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बच्चों के शासक नहीं, सहायक बनें

Bachcho Ke Shasak Nahi Sahayak Bane

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बच्चों के शासक नहीं, सहायक बनें

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Additional Information

Number of Pages 48
ISBN Number 81-89309-02-1
Writer’s name माता भगवती देवी शर्मा
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

बाल मस्तिष्क अपरिपक्व होता है, प्रत्येक बच्चा जन्मकाल से ही निरंतर उत्कर्ष और परिपक्वता की दिशा में अग्रसर रहता है, अपने बच्चे का विकास प्रत्येक माता-पिता चाहते हैं | लेकिन यह आकांक्षा उस समय हानिकारक हो उठती है, जब वे बच्चे के विकास की प्रक्रिया के समझदार दर्शक न रहकर अधीर हो उठते हैं और बच्चे को शीघ्र से शीघ्र समझदार बना डालने के लिए बेचैन होकर सीख के नाम पर उस पर शासन करने लगते हैं | इसका परिणाम विपरीत ही होता है, बच्चे का मस्तिष्क माता-पिता के निर्देशों का अर्थ नहीं समझ पाता और गलत अर्थ लगा लेता है, इससे शिशु के मानसिक विकास को क्षति पहुँचती है अतः आवश्यकता इस बात की है कि बच्चे के मस्तिष्कीय विकास में हम सहायक बनें, बच्चे को आत्म निर्भर बनने दें, उसे समझदार बनाने के फेर में परावलम्बी न बना डालें | आवश्यकता से अधिक निर्देश देने पर बच्चा सदैव माता-पिता की इच्छा ही भाम्पता-ताकता रहता है, क्योंकि वह समझता है कि प्रशंसा और पुरस्कार प्राप्ति का यही एक मार्ग है-ऐसे में उसकी स्वतंत्र निर्णय शक्ति कुंद होने लगती है |

 

Product Description

 

बालक की सामर्थ्य स्वतः ही विकासशील होती है | आवश्यकता मात्र इस बात की होती है की उसकी विकास दिशा के प्रति जागरूक रहा जाये और सहायता की जाये | उदाहरण  के लिए एक वर्ष का बच्चा जब खड़े होने का प्रयास करता है तो उसे इतनी बुद्धि नहीं होती कि वह पहले यह अनुमान लगाये कि उसमें  खड़े होने की सामर्थ्य आ भी गई है या नहीं ? वह तो माता-पिता की तरह या बड़े भाई-बहिनों की तरह स्वयं भी अपने पांवों पर खड़ा होना चाहता है, इसके लिए वह सीधे खड़े होने की कोशिश करता है | इस प्रयास में वह बार बार गिरेगा, किन्तु यदि माता-पिता उसके इस प्रयास को देखकर उसे गिरने न देने की चिंता से गोदी में उठा लें तो बच्चे के प्रति अन्याय होगा, उसका स्वाभाविक विकास रुक जायेगा | यही बात बच्चों के सीढ़ियाँ चढ़ने पर लागू होती है, गेंद आदि खेल रहा बच्चा किसी कुएँ के बिल्कुल पास न पहुँच जाए या सड़क पर न चला जाए-इतनी भर ही सावधानी पर्याप्त है | उसके दौड़ने, गिरने-पड़ने से बहुत परेशान होना भी अनावश्यक है |

 

 

१ बच्चों में अच्छी आदतें पैदा करें और बढायें

२ साधारण आदतें तथा नियमित दिनचर्या

३ बच्चे घर की पाठशाला में

४ बच्चों के शासक नहीं, सहायक बनें

 

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