हमारे सात आन्दोलन
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पिछले हजार वर्षों से जिस अज्ञानांधकार युग में हमें रहना पड़ा है, उसके फलस्वरूप हमारे चिंतन की दिशा में विकृतियों की मात्रा इतनी बढ़ गई कि प्रगति के लिए किए गए सभी प्रयत्न उलटे पड़ते हैं | सुधार एवं प्रगति की सभी योजनाएं चारित्रिक दुर्बलता से टकराकर निष्फल हो जाती हैं | कारण की तह तक हमें जाना होगा और भावनात्मक नवनिर्माण, जो जनमानस को चरित्रनिष्ठा, आदर्शवादिता, मानवीय, सदभावना, प्रचंड कर्मठता और औचित्य को अपनाने की साहसिकता से ओतप्रोत कर दे | इस आन्दोलन को जितनी सफलता मिलती जाएगी, उसी क्रम से प्रगति का पथ प्रशस्त होता चला जाएगा | के लिए एक ऐसा प्रचंड अभियान चलाना होगा
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