जीवन देवता की साधना - आराधना
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मानव जीवन एक सम्पदा के रूप में हम सबको मिला है | शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक हर क्षेत्र में ऐसी ऐसी अदभुत क्षमताएँ छिपी पड़ी हैं कि सामान्य बुद्धि से उभरा कल्पना भी नहीं की जा सकती | यदि उन्हें विकसित करने की विद्या अपनाई जा सके तथा सदुपयोग की दृष्टि पाई जा सके तो जीवन में लौकिक एवं परलौकिक संपदाओं विभूतियों के ढ़ेर लग सकते हैं |
परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि मनुष्य को मानवोचित ही नहीं देवोपम जीवन जी सकने योग्य साधन प्राप्त होते हुए भी वह पशुतुल्य दीन -हीन जीवन इसलिए जीता कि वह जीवन को परिपूर्ण, सर्वांगपूर्ण बनाने के मूल तथ्यों पर न तो ध्यान देता है, न उसका अभ्यास करता है | जीवन को सही ढंग से जीने की कला जानना तथा कलात्मक ढंग से जीवन -जीना ही जीवन की कला कहलाती है व आध्यात्मिक वास्तविक व्यावहारिक स्वरूप यही है | अपने को श्रेष्ठतम लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए सदगुणों -सत्प्रवृत्तियों के विकास का जो अभ्यास किया जाता है, उसी को जीवन साधना कहते हैं | उसी को जीवन-रूपी देवता की साधना -आराधना भी कह सकते हैं |
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यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है | अवांछनीयता अपना कर पतन के गर्त्त में गिरने की तथा उत्क्रष्ट्ता का वरन कर के उत्कर्ष के चरम -लक्ष्य तक जा पहुँचने की उसे पूरी छुट है | मन:स्थिति सुधारे बिना कोई परिस्थितियों का ही रोना रोता रहे तो उस विडम्बना रचा बैठे प्रमाद ग्रस्त से कोई क्या कह सकता है? परमपूज्य गुरुदेव ने तात्कालिक फलदायक, अनुदान देने के लिए आतुर एवं सबसे निकटवर्ती आत्म -देवता से बढ़कर श्रेष्ठ किसी को नहीं माना है | अन्य देवताओं की अनुकम्पा संदिग्ध हो सकती है किन्तु जीवन देवता की साधना का प्रतिफल असंदिग्ध रूप से मिलकर रहता है | जीवन का महत्त्व यदि मनुष्य समझ ले, एक-एक क्षण का सही उपयोग कर ले तो वह निश्चित ही स्वयं को रिद्धि -सिद्धियों, से सम्पन्न बना सकता है, किन्तु दुर्भाग्यवश बहुतों के साथ ऐसा नहीं हो पाता |
जीवन साधना नकद धर्म है | इसके प्रतिफल को प्राप्त करने के लिए किसी को लम्बे समय की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती | " इस हाथ दे -उस हाथ ले" का नकद सौदा इस मार्ग पर चलते हुए हर कदम पर फलित होता रहता है | जीवन साधना यदि तथ्यपूर्ण, तर्कसंगत और विवेकपूर्ण स्तर पर की गई हो तो उसका प्रतिफल दो रूपं में हाथों -हाथ मिलता चला जाता है | एक संचित पशु प्रवृत्तियों से पीछा छुटता है, उनका अभ्यास छुट जाता है एवं दूसरा लाभ यह होता है कि नर-पशु से देव -मानव बनाने के लिए जो प्रगति करनी चाहिए, उसकी व्यवस्था सही रूप से बन पड़ती है | स्वयं को अनुभव होने लगता है कि व्यक्तित्व निरंतर उच्चस्तरीय बन रहा है | उत्कृष्टता और आदर्शवाद की दोनों ही उपलब्धियाँ निरंतर हस्तगत हो रही हैं | जीवन की सार्थकता के रूप श्रेष्ठतम उपलब्धि यही है, जिस पर संकेत करते हुए पूज्यवर लिखते हैं कि, जीवन साधना का दर्शन यदि ठीक तरह समझ में आ जाए व सही प्रयोग का अभ्यास बन जाय तो मनुष्य अनेकानेक उपलब्धियाँ सहज ही इसी जीवन में पा सकता हैं |

