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चेतना की शिखर यात्रा - भाग २

Chetana Ki Shikhar Yatra - Part 2

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चेतना की शिखर यात्रा - भाग २

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Number of Pages 464
ISBN Number 81-8255-005-9
Writer’s name डॉ० प्रणव पण्ड्या
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Hard Bound
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

ताई जी नियमित रूप से द्वारकाधीश मंदिर जाया करती थीं | कभी कभार श्रीराम भी साथ हो जाते | साथ जाने के लिए वे शाम का समय ही चुनते थे | साढ़े छह बजे होने वाली शयन आरती में ताई जी के साथ शामिल होकर वे विश्राम घाट पर आ जाते | यमुना की संध्या आरती उन्हें लुभाती थी | लोग दोना- पत्तों में दीप जलाकर रखते और यमुना के प्रवाह में छोड़ देते | श्रीराम स्वयं दीपक प्रवाहित नहीं करते | ताई जी अवश्य आरती के बाद दीप जलातीं | वे खड़े खड़े उन्हें देखते रहते | कहीं जरुरत होती तो हाथ बटाते | और मन होता तो विश्राम घाट की सीढियां उतर कर धारा  में खड़े हो जाते | आरती और दीपदान के क्रम में एक बार श्रीराम ने विनोद किया, 'ताई आज तो यमुना में सीधे उतर जाउ | '

 

Product Description

 

'क्या मतलब ? 'ताई ने डांट कर पूछा | श्रीराम बोले, 'यह की आज सीढ़ी पर बैठ कर मुँह धोने और आचमन करने के बजाय यमुना में उतर कर ही आचमन कर लूँ | '

 

ताईजी समझ गईं कि लाड़ला मजाक कर रहा है | उन्होंने मजाक करते हुए ही आँखें तरेरी और श्रीराम को घुर कर देखा श्रीराम धीरे से हंस दिए और सीढ़ियों पर बैठकर आचमन पर करने लगे | वहां दीपदान कर रहे लोगों में किसी ने ध्यान नहीं दिया कि माँ बेटे में विनोद चल रहा है दीपदान के बाद दोनों सीढ़ियाँ चढ़ कर आये तो सामने खड़े एक तेजस्वी साधु ने उन्हें टोका | संन्यासी वैष्णवी संप्रदाय का अनुयायी था और माथे पर तिलक लगाए हुए था | उसने कहा, 'बेटा माँ की गोद में तो किसी भी अवस्था में उतरा जा सकता है | यह विधि निषेध क्यों मानते हो कि आचमन करके हीधारा  में उतरना चाहिए ? '

 

इस तरह सीढ़ियों पर ही रोक लेना और साधू द्वारा उपदेश देना अप्रत्याशित था श्रीराम ने साधु को प्रणाम किया और बोले, 'मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं है लेकिन मेरी माँ कहती है, इसलिए कभी कुछ सोचा नहीं | माँ का कहना ही मैं उचित मानता हूँ | '

 

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