चेतना की शिखर यात्रा - भाग २
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ताई जी नियमित रूप से द्वारकाधीश मंदिर जाया करती थीं | कभी कभार श्रीराम भी साथ हो जाते | साथ जाने के लिए वे शाम का समय ही चुनते थे | साढ़े छह बजे होने वाली शयन आरती में ताई जी के साथ शामिल होकर वे विश्राम घाट पर आ जाते | यमुना की संध्या आरती उन्हें लुभाती थी | लोग दोना- पत्तों में दीप जलाकर रखते और यमुना के प्रवाह में छोड़ देते | श्रीराम स्वयं दीपक प्रवाहित नहीं करते | ताई जी अवश्य आरती के बाद दीप जलातीं | वे खड़े खड़े उन्हें देखते रहते | कहीं जरुरत होती तो हाथ बटाते | और मन होता तो विश्राम घाट की सीढियां उतर कर धारा में खड़े हो जाते | आरती और दीपदान के क्रम में एक बार श्रीराम ने विनोद किया, 'ताई आज तो यमुना में सीधे उतर जाउ | '
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'क्या मतलब ? 'ताई ने डांट कर पूछा | श्रीराम बोले, 'यह की आज सीढ़ी पर बैठ कर मुँह धोने और आचमन करने के बजाय यमुना में उतर कर ही आचमन कर लूँ | '
ताईजी समझ गईं कि लाड़ला मजाक कर रहा है | उन्होंने मजाक करते हुए ही आँखें तरेरी और श्रीराम को घुर कर देखा | श्रीराम धीरे से हंस दिए और सीढ़ियों पर बैठकर आचमन पर करने लगे | वहां दीपदान कर रहे लोगों में किसी ने ध्यान नहीं दिया कि माँ बेटे में विनोद चल रहा है | दीपदान के बाद दोनों सीढ़ियाँ चढ़ कर आये तो सामने खड़े एक तेजस्वी साधु ने उन्हें टोका | संन्यासी वैष्णवी संप्रदाय का अनुयायी था और माथे पर तिलक लगाए हुए था | उसने कहा, 'बेटा माँ की गोद में तो किसी भी अवस्था में उतरा जा सकता है | यह विधि निषेध क्यों मानते हो कि आचमन करके हीधारा में उतरना चाहिए ? '
इस तरह सीढ़ियों पर ही रोक लेना और साधू द्वारा उपदेश देना अप्रत्याशित था | श्रीराम ने साधु को प्रणाम किया और बोले, 'मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं है लेकिन मेरी माँ कहती है, इसलिए कभी कुछ सोचा नहीं | माँ का कहना ही मैं उचित मानता हूँ | '

