आत्मिक प्रगति के लिए अवलंबन की आवश्यकता
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श्रद्धा का आरोपण - गुरु तत्त्व का वरण
अध्यात्म क्षेत्र मन श्रद्धा की शक्ति को सर्वोपरि माना गया है | एक ही मन्त्र, एक ही साधना पद्धति एवं एक ही गुरु का अवलंबन लेने पर भी विभिन्न साधकों के आत्मिक प्रगति की गति भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है | इस भिन्नता का मूल कारण है - श्रद्धा, समर्पण, इष्ट के प्रति ऐसा लगाव की दोनों एक रूप हो जाएँ | जहाँ श्रद्धा नहीं होती, वहाँ सभी उपचार बाह्य कर्मकांडादि निष्प्राण बने रहते हैं | गीताकार ने ठीक ही कहा है-श्रद्धामये यं पुरुषः यो स एव सः अर्थात जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह स्वयं भी वही अर्थात उसके अनुरूप बन जाता है, ढल जाता है | शिष्य और गुरु के मध्य जो श्रद्धा के सूत्रों का सशक्त बंधन रहता है, वही लक्ष्य तक पहुँचने में, अध्यात्म क्षेत्र की समस्त विभूतियाँ हस्तगत करने में प्रमुख भूमिका निभाता है |
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जिस श्रद्धा के सहारे मीरा ने गिरधर गोपाल को साथ रहने के लिए विवश किया, एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मिट्टी से बनी प्रतिमा को असली द्रोण से भी अधिक समर्थ बनाया था, रामकृष्ण परमहंस ने पत्थर की प्रतिमा को जीवंत काली जैसा भोग ग्रहण करने के लिए सहमत कर लिया था, वह श्रद्धा तत्व ही आत्मिक प्रगति का आधार भूत कारण है | इसे उपार्जित करने के लिए जीवंत गुरु का आश्रय लेना पड़ता है | व्यायामशाला में प्रवेश करके ही बलिष्ठ पहलवान बनाने की बात सधती है | डम्बलों-मुगदरों के सहारे भुजदंड मजबूत किये जाते हैं | श्रद्धा संवर्द्धन के लिए गुरु के प्रतीक को सदाशयता की प्रतिमा मानकर चलना होता है | यह भाव निर्धारण प्रायः वैसा ही है जैसा की मिट्टी के ढेले से कलावा लपेट कर उसे श्रद्धा-आरोपण द्वारा साक्षात् गणेश जैसा समर्थ बनाया जाता है |
जीवन में हर महत्वपूर्ण कार्य के लिए शिक्षण प्रक्रिया एवं शिक्षक के अवलंबन की आवश्यकता पड़ती है ! अभिभावकों को विशेष रूप से माता की यह भूमिका सर्वप्रथम निभानी व बच्चे में सुसंस्कारिता समाविष्ट करनी होती है ! आत्मिक प्रगति की जब भी चर्चा होती है, मार्गदर्शन एवं सहयोग के लिए "सदगुरु" का आश्रय लिए जाने की बात कही जाती है ! जन समुदाय की प्रवृत्तियाँ लोक प्रचलन के अनुरूप होने के कारण यह कार्य एक प्रकार से प्रवाह के विरुद्ध चलने के समान है, जैसा कि अधिकांश व्यक्ति सोचते व करते रहते हैं ! आत्मिक प्रगति के लिए भिन्न स्तर का सोच अपनाने के लिए व तदनुरूप अपने क्रिया-कलापों को ढलने के लिए एक सशक्त अवलंबन की आवश्यकता पड़ती है ! यह कार्य किन्हीं समर्थ आदर्शवादी, श्रेष्ठ स्तर के व्यक्तित्वों के साथ घनिष्ठता स्थापित करने पर ही बन पड़ता है ! इसी व्यवस्था को गुरुवरण या गुरु दीक्षा कहते हैं ! गुरु दीक्षा अर्थात गुरु के रूप में एक ऐसी सत्ता को सम्पूर्ण समर्पण जो उत्कृष्टताओं का, सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय हो ! जिसके पद चिन्हों पर चलकर, जिसके द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन को अपनाकर अपना जीवन भी वैसा ही श्रेष्ठतम व सार्थक बनाया जा सके ! यह समर्पण सघन श्रद्धा के माध्यम से ही बन पड़ता है !

