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युग संस्कार पद्धति

Yug Sanskar Paddhati

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युग संस्कार पद्धति

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Number of Pages 24
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2006
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

परम पूज्य गुरुदेव ने उज्जवल भविष्य की संरचना के लिए, सुसंस्कारी व्यक्तित्वों के निर्माण एवं विकास की अनिवार्य आवश्यकता बार-बार बतलायीहै व्यव्क्तित्व निर्माण के क्रम में धर्म तंत्र से लोकशिक्षण  के अंतर्गत संस्कार प्रक्रिया  का असाधारण  महत्व है | अभियान को गति देने के सूत्रों पर चर्चा  करते हुए पूज्य गुरुदेव ने कहा था -  " अगले ही चरण में समाज में संस्कार अभियान तीव्रतर होगा | समाज की माँग को पूरा  करने के लिए बड़ी संख्या में संस्कार -सम्पन्न करने वाले पुरोहित की आवश्यकता पड़ेगी | दैवी चेतना के प्रभाव से बड़ी संख्या में प्रतिभा -सम्पन्नों, भावनाशीलों मेंऐसी  उमंगें जागेंगी, जो उन्हें थोड़े या बहुत समय के लिए पुरोहित के गरिमामय कार्य में प्रवृत होने के लिए बाध्य करेंगी | वे सांसारिक व्यस्तता, लोभ -मोह से ऊपर उठकर इस कार्य के लिए समय और श्रम लगायेंगे, किन्तु संस्कृत भाषा का पूर्वाभ्यास न होने से उन्हें प्रचलित पद्वति से कर्मकांड करने में बाधा पड़ेगी | इस बाधा को दूर करके उत्पन्न होने वाली मांग के अनुरूप, बड़ी संख्या में सेवा भवी पुरोहितों को तैयार किया जा सकेगा |"

उक्त  उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने कर्मकाण्ड के लिए श्लोक-परक मन्त्रों के स्थान पर सूत्र -मन्त्रों के प्रयोग की विधा  पुन; विकसित कर   दी | प्राचीन काल में सूत्र  पद्धति  बहुत लोकप्रिय रह चुकी है कालान्तर में समय के प्रभाव से श्लोक पद्धति  प्रचलन में आ गयी | अब युग की माँग के अनुरूप सूत्र पद्धति  को पुन स्थापित करना आवश्यक हो गया है | इसीलिए पूज्य गुरुदेव ने अगले चरण के रूप में दीपयज्ञ तथा संस्कारों के लिए सूत्र पद्धति  विकसित करके दी

Product Description

 

प्रथम प्रयोग के रूप में सामूहिक दीप यज्ञों के लिए युग यज्ञ -पद्वति असामान्य लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी है | अब विवाह, अंत्येष्टि एवं मरणोत्तर (श्राद्ध   ) संस्कारों के अतिरिक्त अन्य सभी संस्कारों को, सूत्र मन्त्रों को प्रधानता देते हुए संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है | आवश्यकता के अनुसार विवेकपूर्वक सुगम श्लोकों का प्रयोग भी उचित स्थानों पर किया गया है | प्रयुक्त श्लोक भी बहुत प्रचलित तथा सुगम हैं, इसीलिए संस्कृत न जानने वाले सुशिक्षित परिजन भी थोड़े से अभ्यास से कर्मकाण्ड सम्पन्न करने में सफल होगें

 

क्रम व्यवस्था - कोई भी संस्कार करने के लिए समय और परिस्थितियों के अनुरूप यज्ञ अथवा दीपयज्ञ के साथ संस्कार कराए जा सकते हैं | प्रारम्भ में क्रमश; मंगलाचरण, षट्कर्म, तिलक एवं रक्षा सूत्र के बाद कलशपूजन, देवपूजन , स्वस्तिवाचन आदि कर्मकाण्ड सम्पन्न करायें जायें इसके बाद संस्कार के विशेष कर्मकाण्ड करायें प्रत्येक क्रिया से जुड़े सूत्र हिंदी में समझाकर संस्कृत में दुहारवाये जायें, क्रिया के समय निर्धारित मन्त्र बोले जायें | तदुपरान्त अग्रिस्थापन करवाकर गायत्री मन्त्र की आहुतियाँ दी जायें | गायत्री मन्त्र की आहुतियों के बाद ५ आहुतियाँमहाम्रत्युन्जय  मन्त्र से दी जायें |   

 

पूर्णाहुति के पूर्व संस्कार विशेष का सड्कल्प कराया जाए | प्रत्येक संस्कार के साथ जुड़े दायित्वों को पूरा करने का व्रत यजमान परिवार के परिजनों को दिलाये जाने की व्यवस्था संकल्प क्रम में रखी गयी है | सड्कल्प बुलवाकर पूर्णाहुति सम्पन्न करायी जाए | यदि दीप-यज्ञ है,तो संड्कल्प के अक्षत -पुष्प दीप पूजास्थली पर अर्पित कराए जायें | यज्ञ हो, तो संड्कल्प करवाकर उस दायित्व बोध के साथ पूर्णाहुति कराएँ | सभी संस्कारों में इसी प्रकार का क्रम रहेगा| इस विधा का प्रयोग शांतिकुंज में शपथ समारोह के साथ प्रारंभ कर दिया गया है | सूत्रों को दुहराए जाने से संस्कार करने वालों केअन्तस  में अधिक उमंगें भी उठती हैं और सिद्धांतों को समझने -याद रखने में सुविधा होती है

 

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