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समाज का मेरुदण्ड सशक्त परिवार तन्त्र

Samaj Ka Merudand Sashakt Pariwar Tantra

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समाज का मेरुदण्ड सशक्त परिवार तन्त्र

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Number of Pages 699
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य, ब्रह्मवर्चस्
Edition/Year of Publishing 1998
Hard Bound/Paper Back Hard Bound
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

प्रजातंत्र की एक सशक्त इकाई के रूप में परिवार संस्था को माना गया है। व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में परिवार का नाम लिया जाता है। व्यक्ति को उठाने-गिराने में पारिवारिक वातावरण का जितना प्रभाव पड़ता है, उतना अन्य समस्त साथियों एवं माध्यमों के संयुक्त साधनों का कदाचित ही पड़ता है। सुसंस्कृत परिजनों के बीच मनुष्य गरीबी में भी जीवनयापन कर सकता है; परन्तु गृहकलह के बीच तो संपन्नता भी नीरस और असह्य हो जाती है। भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता रही है कि इसमें परिवार संस्था को अत्याधिक महत्व दिया जाता रहा है। परिवार निर्माण की, समाज के नव-निर्माण एवं राष्ट्रोत्थान की सदा से आवश्यकता समझी जाती रही है। समाज के विकास के लिए उसके मेरुदण्ड परिवार के समग्र निर्माण को अपने कार्यक्रम में प्रधानता देने के कारण ही हमारे ऋषिगण परिवार संस्था को एक आदर्श इकाई बनाकर हमें धरोहर के रूप में दे गए। श्रेष्ठ व्यक्तित्वों के समाज रूपी उद्यान में सुगंधित पुष्पों के समान खिलने के लिए परिवार ही नन्दन वन की भूमिका निभाता है। परमपूज्य गुरुदेव ने जीवन भर एक ही बात पर जोर दिया कि समाज में श्रेष्ठ सद्गृहस्थ अधिक से अधिक संख्या में विकसित हों, ताकि सुसंततियाँ जन्म लें और सतयुगी समाज की पृष्ठभूमि बन सके।

 

Product Description

 

वर्तमान युग में विश्व अनेकानेक स्तर की समस्याओं, विपत्तियों एवं विभीषिकओं से घिरा हुआ है। साधन संपन्न एवं बुद्धिमान कहे जाने वाले मानव को आज उद्विग्न एवं आशंकित बनाए रखने वाली विपन्नताओं की बाढ़-सी आ गयी है। गहराई से विचार करते हैं, तो यही निष्कर्ष निकलता है कि चिन्तन व चरित्र की दृष्टि से सड़-गले परिवार अपने कुसंस्कारों की कीचड़ से जिन जहरीले कृमि-कीटकों को जन्म देते हैं, वे ही जनमानस को विकृत करके रख देते हैं। परम पूज्य गुरुदेव युगऋषि के रूप में हम सबके कर्तव्यों को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि आज का एक मात्र युग धर्म ही है कि परिवार संस्था की पावनता एवं प्रगतिशीलता में आए अवरोधों को हम सब मिल-जुलकर दूर करें।

 

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, उसका निर्वाह एकाकी नहीं हो सकता। सहकारिता की इस सत्प्रवृत्ति का सर्वप्रथम शिक्षण परिवार की सुरक्षा एवं प्रगति का ध्यान रखना चाहिए। यदि परिवार संस्था को सद्गुणों की प्रयोगशाला, पाठशाला, फैक्ट्री अथवा नर्सरी मानकर चला जाय और इसके लिए एक आँख प्यार की-दूसरी सुधार की वाली अपनायी जाए, तो यह समाज की सबसे सच्ची सेवा कही जाएगी। परिवार के प्रति यदि सच्ची आत्मीयता, शुभेच्छा, सद्भावना किसी के मन में है तो उसे क्रियान्वित करने का एक मात्र मार्ग यही है कि परिवार के सदस्यों को सद्गुणी, सज्जन, प्रतिभावान एवं सुसंस्कृत बनाया जाय।

 

परमपूज्य गुरुदेव व्यक्ति निर्माण के साथ-साथ परिवार निर्माण के पंचशीलों की भी चर्चा करते हैं और बताते हैं कि श्रमशीलता, सुव्याव्सथा, मितव्ययता, शालीनता और सहकारी उदारता रूपी पंचशीलों की आदत यदि घर-परिवारों में डाली जा सके और इसका बीजारोपण परिवार में किया जा सके, तो इस पुण्य प्रयास के सत्परिणाम हाथों-हाथ देखने को मिल सकते हैं। परिवार व्यक्ति की ही नहीं, समाज के नवनिर्माण की एक कार्य शैली है। यदि सुसंस्कारिता के विभिन्न प्रयोगों के अनवरत जारी रखा जाए तो कोई कारण नहीं कि हम धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण न बना सकें।

 

वाङ्मय के इस खण्ड में परमपूज्य गुरुदेव संयुक्त परिवारों को सौभाग्य एवं समुन्नति का द्वार बताते हैं। उनके अनुसार सम्मिलित कुटुम्ब के, लार्जर फैमिली के, वृहत्तर परिवारों के प्रयोगों के द्वारा ही सामाजिकता का अभ्यास अपने जीवन में करता है। आज परिवार टूटते चले जा रहे हैं। परिवार का हर घटक अपना अलग बसेरा करने की योजना बनाकर संयुक्त कुटुम्ब को तोड़ता दिखाई पड़ता है। सहकारिता के साथ बुजुर्गों का मार्गदर्शन प्राप्त करते हुए रहने का एकमात्र उदाहरण संयुक्त परिवारों में ही देखने को मिल पाता है। इस तंत्र को तोड़कर आज हर व्यक्ति एकाकीपन की ओर अपने स्वयं की सुखसुविधा साधनों की बढ़ोत्तरी की ओर उन्मुख होता दिखाई देता है। यह एकाकीपन अन्ततः तनाव एवं कलह का कारण बनता है। संयुक्त परिवारों को पुनः स्थापित करने के लिए विराट-व्यापक आंदोलन चलाने की आवश्यकता बताते हुए परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि इन्हें थोपा न जाए, बल्कि हँसी-खुशी से मिल-जुलकर रहने जैसा वातावरण विनिर्मित कर एक प्रयोग के रूप में जीने का प्रयास किया जाए।

 

आज सारे विश्व में पारिवारिक मूल्यों के विघटन होते चले जाने, नैतिक मूल्य गिरते चले जाने कुसंस्कारी संतानों, जिनके पिता का नाम तक किसी को ज्ञात नहीं वे बढ़ते चले जाने का एकमात्र कारण परिवार संस्था का विश्रृंखलन है। टूटता परिवार, बिखरता  दाम्पत्य, अवरुद्ध बाल विकास अन्ततः सारी अशांति का और सामाजिक विग्रह का कारण बनता है। इस तंत्र को सुव्यवस्थित बनाये रखने हेतु इस खण्ड में जो मार्गदर्शन दिया गया है वह हर भारतीय की नहीं, सभी राष्ट्रों के परिवारों के लिए पढ़ने एवं हृदयंगम करने योग्य है।

 

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