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ऋषि युग्म का परिचय

Rishi Yugma Ka Parichaya

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ऋषि युग्म का परिचय

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Number of Pages 32
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं . श्री राम शर्मा आचार्य एवं वन्दनीया माताजी की जीवन यात्रा

 

माँ गायत्री के वरद पुत्र महाकाल के अवतारी , जिन्होंने इस विराट गायत्री परिवार का पौधा रोपा , हम सबके परमपूज्य गुरुदेव पंडित श्री राम शर्मा आचार्य , जो अस्सी वर्ष का जीवन जी कर एक विराट ज्योति प्रज्वलित कर उस विराट सत्ता में एकाकार हो गए | माता भगवती देवी शर्मा जो हम सबकी परम वन्दनीया माता जी शक्ति के रूप में शिव की कल्याणकारी सत्ता का साथ देने अवतरित हुई | वे भी सूक्ष्म में विलीन हो स्वयं को अपने आराध्य के साथ एकाकार कर ज्योति पुरुष का एक अंग बन गई  आज दोनों सशरीर हमारे बीच नहीं है ,किन्तु नूतन  स्रष्टि कैसे ढाली गई , कैसे मानव गढ़ने का साँचा बनाया गया , इससे शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस, गायत्री तपोभूमि ,अखंड ज्योति संस्थान  एवं  युग तीर्थ आवलखेड़ा एवं हजारों शक्तिपीठों जैसी स्थापनाओं तथा विशाल गायत्री परिवार के रूप में देखा जा सकता है | इस बहुआयामी रूपों को जिसमे वे सिद्ध साधक गायत्री महाविद्या के उपासक ,ममत्व लुटाने वाले पिता ,मानव मात्र के उत्थान के लिए अभियान चालने वाले ,स्वतंत्रता सेनानी ,ऋषि परम्परा को पुनजीवित करने वाले मनीषी ,विचारक ,लेखक ,वक्ता अकेला व्यक्ति हो, उस महापुरुष के जीवन चरित्र को कैसे लिखा जा सकता है, जिन्होंने  ८० वर्ष के जीवनकाल में ८०० वर्षो से अधिक का कार्य किया हो |

 

Product Description

 

 दोनों  ही सत्ताएँ परम पूज्य गुरुदेव ,परम वन्दनीय माता जी एक दूसरे के लिए समर्पित जीवन जीते रहे | दोनों ही परस्पर सदैव  एक दुसरे को स्वयं का पूरक मानते थे | आदर्शवादी साहसी गायत्री परिवार का सगठन ममत्व की घूटी पिला -पिलाकर दोनों के प्रयास से कैसे खड़ा किया गया है ? यह सब कैसे संभव हुआ ? यह तो उनके जीवनक्रम को पढ़कर ही समझा जा सकता है | संवत १९६८ में आश्विन  कृष्ण  पक्ष की त्रयोदशी तिथि (२० सितम्बर १९११)  को आगरा - जलेसर मार्ग पर स्थित आँवलखेड़ा गाँव में प्रात : ९ बजे बालक श्री राम का जन्म हुआ ,जो बाद में वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं .श्रीराम शर्मा आचार्य कहलाए | पिता श्री रूपकिशोर जी शर्मा तथा माता श्रीमती दानकुँवर जी की प्रथम संतान के रूप में इस अवतारी सत्ता का पृथ्वी पर अवतरण हुआ औद्योगिक , वैज्ञानिक  एवं आर्थिक क्रांति के बाद सारे भारत में आध्यात्मिक क्रांति ,विचार क्रांति का बीजारोपण कर इस महान राष्ट्र  को देव-मानवों की एक पौधशाला बनाने का कार्य इन्हीं महापुरुष के द्वारा हुआ है | इनकी बाल्यकाल से ही अध्यात्मसाधना व गायत्री चर्चा में गहरी रूचि थी |

 

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