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भाव संवेदनाओं की गंगोत्री

Bhav Samvedanao Ki Gangotri

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भाव संवेदनाओं की गंगोत्री

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Number of Pages 32
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

वेदव्यास की अंतर्व्यथा  

 

"आपके चेहरे पर खिन्नता के चिन्ह ?" आगन्तुक ने सरस्वती नदी के तट पर, आश्रम के निकट बैठे हुए मनीषी के मुखमंडल पर छाये भावों को पढ़ते हुए मनीषी के मुखमंडल पर छाये भावों को पढ़ते हुए कहा | इधर विगत कई दिनों से वह व्यथित थे | नदी के तट पर बैठकर घंटों विचार मग्न रहना, शून्य की ओर ताकते रहना, उनकी सामान्य दिनचर्या बन गई थी | आज भी कुछ उसी प्रकार बैठे थे |

आगंतुक के कथन से विचार श्रृंखला टूटी | "अरे | देवर्षि आप ?" चेहरे पर आश्चर्य व प्रसन्नता की मिली-जुली अभिव्यक्ति झलकी |

 

"पर आप व्यथित क्यों हैं ?" उन्होंने पास पड़े आसन पर बैठते हुए कहा - "पीड़ा-निवारक को सामने पड़े पीड़ित को देखकर, उसके कष्ट हरने में असफल होने पर होती है | वैद्य को उस समय होती है, जब वह सामने पड़े रोगी को स्वस्थ कर पाने में असफल हो जाता है |"

 

"विचित्रता नहीं विवशता कहिये | इसे उस अंतर्व्यथा के रूप में समझिये, जो पीड़ा-निवारक को सामने पड़े पीड़ित को देखकर, उसके कष्ट हरने में असफल होने पर होती है | वैद्य को रोग ? कैसी विचित्र स्थिति है ?"

 

Product Description

 

कुछ रूककर उन्होंने गहरी श्वास ली और पुनः वाणी को गति दी | "व्यक्ति और समाज के रूप में मनुष्य सन्निपात के रोग से ग्रस्त है | कभी हँसता है, कभी कुद्कता-फुदकता है; कभी अहंकार के ठस्से में अकड़ा चलता है | परस्पर का विश्वास खो जाने पर आचार-विचार का स्तर कैसे बने ? जो थोडा-बहुत दिखाई देता है, वह अवशेषों का दिखावा भर है | " और परिवार ............." इतना कहकर उनके मुख पर एक क्षीण मुस्कान की रेखा उभरी, नजर उठाकर सामने बैठे, देवर्षि की और देखा, " इनकी तो और भी करुण दशा है | इनमें मोह रह गया है, प्रेम मर गया है | मोह भी तब तक, जब तक स्वार्थ सधे | विवाहित होते ही संताने माँ-बाप को तिलांजलि दे देती हैं | सारी रीती ही उलटी है; उठे को गिराना, गिरे को कुचलना, कुचले को मसलना, यही रह गया है | आज मनुष्य और पशु में भेद आचार-विचार की द्रष्टि से नहीं, बल्कि आकार-प्रकार की द्रष्टि से है | " कहते-कहते ऋषि का चेहरा विवश हो गया | भावों को जैसे-तैसे रोकते हुए धीरे से कहा-"देवता बनाने जा रहा मनुष्य, पशु से भी गया-गुजरा हो रहा है |"

 

"महर्षि व्यास आप तो मनीषियों के मुकुटमणि हैं | जैसे कुछ सोचते हुए देवर्षि ने कहा -" आपने प्रयास नहीं किए |"

"प्रयास !............. प्रयास किए बिना भला जीवित कैसे रहता जो भटकी मानवता को राह सुझाने हेतु प्रयत्नरत नहीं है, हाथ पर हाथ धरे बैठा है, स्वयं की बौद्धिकता के अहं से ग्रस्त है, उसे मनीषी कहलाने, यहाँ तक कि जीवित रहने का भी हक़ नहीं है |"

"किस तरह के प्रयास किए?"

"मानवीय बुद्धि के परिमार्जन हेतु प्रयास | इसके लिए वैदिक मंत्रो का पुन: वर्गीकरण किया | कर्मकांडों का स्वरूप सँवारा ताकि मंत्रो में निहित दिव्य-भावों को ग्रहण करने में सुभीता हो; पर ........|"

"पर क्या ?"

" प्राणों को छोड़कर लोग सिर्फ कर्मकांडों के कलेवर से चिपट गए | वेद,अध्ययन की जगह पूजा की वस्तु बन गए | यहीं तक सीमित रहता, तब भी गनीमत थी | इनकी ऊटपटांग व्याख्याएँ करके, जाती-भेद की दीवारें खड़ी की जाने लगीं |

"फिर ..........?"

" पुराणों की रचना की, जिसका उद्येश्य था, वेद में निहित सत्य-सदविचारों को कथाओं के माध्यम से जन-जन के गले उतारा जा सके, जिससे बौद्धिकता के उन्माद का शमन हो | किन्तु .............|"

" किन्तु क्या ?"

यह प्रयास भी आंशिक सफल रहा | सहयोगियों ने स्मृतियाँ रचीं, पर यह सब बुद्धिमानों के जीविकोपार्जन का साधन बनकर रह गए | जन-जन के मानस में फेर-बदल करने का अभियान पूरा नहीं हुआ | बुद्धि सुधरी नहीं, अहं गया नहीं, परिणाम महाभारत के युद्धोन्माद के रूप में सामने आया | विज्ञान, धन का गुलाम और धन दुर्बुद्धि के हाथ की कठपुतली; सारे साधन इसी के इर्द-गिर्द | अपने को ज्ञानी कहने व विद्वान् -बुद्धिमान -बलवान समझने वाले, सभी दुर्बुद्धि के दास सिद्ध हुए | देश और समाज का वैभव एक बार फिर चकनाचूर हुआ, पर में अकेले चलता रहा- प्रयासों में शिथिलता नहीं आने दी |" महर्षि के स्वर में उत्साह था और देवर्षि के चेहरे पर उत्सुकता झलक रही थी |

 

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