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शिक्षा ही नहीं विद्या भी

Shiksha Hi Nahi Vidya Bhi

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शिक्षा ही नहीं विद्या भी

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Number of Pages 32
Writer’s name पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
Edition/Year of Publishing 2009
Hard Bound/Paper Back Paper Back
Publisher name युग निर्माण योजना, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

Quick Overview

 

इन दिनों प्रस्तुत असंख्य विपत्तियों का सबसे बड़ा निमित्त कारण एक ही है कि मनुष्य अदुरदर्शिता की व्याधि से ग्रस्त है | उसे लगता है कि तात्कालिक रसास्वादन को ही सब कुछ मान लिया जाए | जो कुछ सोचा या दिया जाए, उसे अपने आपे तक ही सीमित रखा जाए | बहुत हुआ तो उन्हें भी कुछ सहारा दे दिया जाए, जिनसे लाभ मिलता है या मिलने वाला है | इसके अतिरिक्त जो भी प्राणी या पदार्थ संसार में शेष रहते हैं, उनका दोहन किया जाए | वैसा न बन पड़े, तो उपेक्षित छोड़ दिया जाए | अन्यान्यों के प्रति भी अपना कुछ कर्तव्य या उत्तरदायित्व है, इसे समझने या क्रियान्वित करने की अभिरुचि एक प्रकार से समाप्त जैसी ही हो गई है | योजनाएँ बनाने और प्रयास करने के लिए एकमात्र स्वार्थपरता ही शेष रहती है | परमार्थ तो मात्र मनोविनोद जैसी चर्चा का विषय रह जाता है | बहुत हुआ तो आत्म विज्ञापन के लिए उदारचेता होने का ढिंढोरा पिटवा कर अपनी मलीनता पर तनिक सी पॉलिश पोत ली |

 

Product Description

 

एक भाषा-भाषी क्षेत्र का निवासी यदि दूसरी भाषा बोलने वाले क्षेत्र में बसने जाए, तो सर्वप्रथम उसे नए क्षेत्र की भाषा का अभ्यास करना पड़ेगा | वहाँ के रहन-सहन रीति-रिवाज, विचार, संस्कृति आदि से परिचित होने की आवश्यकता पड़ेगी | यदि इस सीखने-जानने में उपेक्षा बरती जाए, तो पग-पग पर गूँगे, बहरे, अजनवी की तरह परेशान होना पड़ेगा | ईसाई पादरी प्राय; योरोपीय देशों से आते हैं | अपने उद्येश्य को पूरा करने के लिए वे एशिया-अफ्रीका आदि महाद्वीपों में जाकर बसते हैं और प्रमुख रूप से पिछड़े इलाकों को अपना कार्य क्षेत्र चुनते हैं | इससे पूर्व उन्हें वहाँ की भाषा, संस्कृति, समस्या आदि से परिचित होना पड़ता है, साथ ही यह भी जानना होता है कि उनके साथ किस प्रकार घुला-मिला जा सकता है | यदि इस प्रक्रिया को न अपनाया जाए और किसी भी पादरी को वहाँ भेज दिया जाए, तो वह उस अपरिचित स्थिति में कोई सफलता अर्जित न कर सकेगा |

इक्कीसवीं सदी एक प्रकार से ऐसी परिस्थितियों वाली अवधि या परिधि है, जिसमें प्रवेश करने वालों को पुरानी आदतें भुलानी और नए सिरे से नई जानकारियाँ अर्जित करके व्यवहार में उतारनी पड़ेगी | इसके बिना गाड़ी एक भी कदम आगे न चल सकेगी |

 

युग परिवर्तन में मनुष्यों की आकृति तो अब जैसी रहेगी, पर उनकी प्रकृति बदल जाएगी | प्रकृति से यहाँ तात्पर्य-मान्यता, भावना, विचारणा, इच्छा और गतिविधियों का समुच्चय है | यों प्रकृति शब्द संसार को गतिशील रखने वाले प्रवाह को भी कहते हैं; पर यहाँ तात्पर्य मात्र गुण, कर्म, स्वभाव से है | परिवर्तन इन्हीं में होना है | उज्जवल भविष्य की सम्भावना वाली भवितव्यता पूरी तरह इसी केंद्र -बिंदु पर निर्भर है | इसलिए परिवर्तन की चर्चा करने वाले प्राय:यही कहते हैं कि अगले दिनों सर्व साधारण की न सही, विचारवानों की प्रकृति तो लगभग इतनी बदल जाएगी, जिसे आमूलचूल हेर-फेर के रूप में देखा जा सके |

 

इन दिनों प्रस्तुत असंख्य विपत्तियों का सबसे बड़ा निमित्त कारण एक ही है कि मनुष्य अदुरदर्शिता की व्याधि से ग्रस्त है | उसे लगता है कि तात्कालिक रसास्वादन को ही सब कुछ मान लिया जाए | जो कुछ सोचा या दिया जाए, उसे अपने आपे तक ही सीमित रखा जाए | बहुत हुआ तो उन्हें भी कुछ सहारा दे दिया जाए, जिनसे लाभ मिलता है या मिलने वाला है | इसके अतिरिक्त जो भी प्राणी या पदार्थ संसार में शेष रहते हैं, उनका दोहन किया जाए | वैसा न बन पड़े, तो उपेक्षित छोड़ दिया जाए | अन्यान्यों के प्रति भी अपना कुछ कर्तव्य या उत्तरदायित्व है, इसे समझने या क्रियान्वित करने की अभिरुचि एक प्रकार से समाप्त जैसी ही हो गई है | योजनाएँ बनाने और प्रयास करने के लिए एकमात्र स्वार्थपरता ही शेष रहती है | परमार्थ तो मात्र मनोविनोद जैसी चर्चा का विषय रह जाता है | बहुत हुआ तो आत्म विज्ञापन के लिए उदारचेता होने का ढिंढोरा पिटवा कर अपनी मलीनता पर तनिक सी पॉलिश पोत ली |

 

आज की मान्यता यही है | इसी आधार पर सोचा-विचारा जाता है और जो कुछ करना होता है, उसका ताना- बाना बुना जाता है | फलत: वही बन पड़ता है जिसे मानवी गरिमा के सर्वथा प्रतिकूल कहा जा सके | आत्म केन्द्रित स्वार्थ परायण व्यक्ति, क्रमश: इतना निष्ठुर और कृपण हो जाता है कि अपनी उपलब्धियों में से राई-रत्ती भी सत्प्रयोजनों के लिए लगाने का मन नहीं करता | निष्ठुरता इतनी बढ़ जाती है कि दूसरों की पीड़ा एवं पत्नोंमुख स्थिति में सहारा देने के लिए राई-रत्ती उत्साह भी नहीं उभरता | लोक लाज की विवशता से यदाकदा कभी ऐसा कुछ करना पड़े, तो उसके बदले भी सस्ती वाहवाही को अपेक्षाकृत कहीं अधिक मात्र में लुट लेने का उद्येश्य रहता है | जिससे बदला मिलने की आशा रहती है, उसी के साथ सद्व्यवहार का, सहायता का हाथ उठता है | यही है वह मौलिक दुष्प्रवृत्ति, जिसने असंख्यों छल प्रपंचों, अपराधों और अनर्थों को जन्म दिया है | बढ़ते-बढ़ते वह स्थिति अब इस स्तर तक पहुँच गई है कि हर किसी को अपनी छाया तक से डर लगने लगा है | लोकहित का ढिंढोरा पीटने वालों के प्रति सहज आशंका बनी रहती है कि कंही कुछ सर्वनाशी अनर्थ का संरजाम तो खड़ा नहीं कर दिया है |

 

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